AIPOC: राष्ट्रीय विकास में विधायिकाओं की भूमिका पर जोर
नीति आयोग द्वारा कभी “समस्या ग्रस्त राज्य” कहे जाने वाला उत्तर प्रदेश अब राजस्व अधिशेष प्राप्त कर अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुका है और सुधारोन्मुखी शासन के लिए पहचान बना रहा है. वर्ष 2014 के बाद से भारत इस दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ा है और उत्तर प्रदेश, प्रधानमंत्री के विकसित और आत्मनिर्भर भारत के विजन के अनुरूप अपनी नई पहचान गढ़ रहा है.
AIPOC: उत्तर प्रदेश विधान मंडल में आयोजित 86 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) का समापन बुधवार को हो गया. सम्मेलन के दौरान सार्थक और गहन चर्चा हुई साथ ही देशभर से आए पीठासीन अधिकारियों के विचारों के आदान-प्रदान से संसदीय विमर्श समृद्ध हुआ है. सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश ने उत्तर प्रदेश की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि सकल राज्य घरेलू उत्पाद, प्रति व्यक्ति आय, बजट आकार, निर्यात और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं.
हरिवंश ने कहा कि नीति आयोग द्वारा कभी “समस्या ग्रस्त राज्य” कहे जाने वाला उत्तर प्रदेश अब राजस्व अधिशेष प्राप्त कर अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुका है और सुधारोन्मुखी शासन के लिए पहचान बना रहा है. उन्होंने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में आर्थिक सशक्तता, रणनीतिक क्षमता और तकनीकी प्रगति को राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य बताते हुए कहा कि वर्ष 2014 के बाद से भारत इस दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ा है और उत्तर प्रदेश, प्रधानमंत्री के विकसित और आत्मनिर्भर भारत के विजन के अनुरूप अपनी नई पहचान गढ़ रहा है.
नीति निर्माण का उदाहरण
राज्य के विजन डॉक्यूमेंट–2047 का उल्लेख करते हुए उपसभापति ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के दोनों सदनों में 27 घंटे से अधिक समय तक चली चर्चा की सराहना की और इसे सहभागी शासन व सहमति आधारित नीति निर्माण का उदाहरण बताया. उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्यों द्वारा स्पष्ट और दूरदर्शी विकास रोडमैप तैयार करना आवश्यक है, जिसमें उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है. वर्ष 2017 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश में लगभग छह करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे हैं. उन्होंने राज्य सरकार के वर्ष 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने, अगले पांच वर्षों में विकास दर 20 प्रतिशत तक ले जाने तथा 2047 तक छह ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य का उल्लेख किया. इसके साथ ही राष्ट्रीय जीडीपी में राज्य की हिस्सेदारी 9.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 16 प्रतिशत करने का लक्ष्य भी रखा गया है.
विधायिकाओं और सरकारों की साझा जिम्मेदारी पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि सभी का समान उद्देश्य सूचित विमर्श, सुदृढ़ नीति निर्माण और दूरदर्शी दृष्टि के माध्यम से राष्ट्रीय विकास में योगदान देना है. उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के प्रयासों की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक को संसदीय परंपराओं के साथ समन्वित करने से सदन की कार्यवाही अधिक प्रभावी और समावेशी बनी है. डिजिटल उपकरणों के उपयोग, प्रक्रिया नियमों में सुधार तथा अवधी, भोजपुरी, बुंदेली और ब्रज जैसी क्षेत्रीय बोलियों में समकालीन अनुवाद की व्यवस्था से जनप्रतिनिधियों की भागीदारी बढ़ी है. सम्मेलन के समापन उन्होंने विश्वास जताया कि 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन से प्राप्त विचार और सुझाव देशभर की विधायी संस्थाओं को सशक्त बनाएंगे और भारत की लोकतांत्रिक नींव को और मजबूत करेंगे.
