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अम्मा के बाद एआइएडीएमके से भाजपा की ऐसे बढ़ रही नजदीकी

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अम्मा के बाद एआइएडीएमके से भाजपा की ऐसे बढ़ रही नजदीकी

तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद उभरे राजनीतिक परिदृश्य में एआइएडीएमके और भाजपा के बीच बढ़ती नजदीकी बहुत हद तक साफ-साफ देखी जा सकती है. हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जयललिता के बीच भी अच्छे संबंध थे. राजनीतिक दृष्टि से अलग-अलग चलते हुए भी दोनों ने दलगत स्तर पर भी एक-दूसरे की मदद की थी, लेकिन अब जबकि जयललिता दुनिया में नहीं रहीं, एआइएडीएमके में उनके जैसा चमत्कारी नेता नहीं है और नेतृत्व के सवाल पर पैदा हो सकने वाला संकट अब तक टला नहीं है, भाजपा की सहानुभूति उसे अपने करीब लाती दिखती है. गुजरात दंगों के बाद जब मोदी भारतीय राजनीति में अलग-थलग किये जाने के अभियान का मुकाबला कर रहे थे, तब जयललिता के उनसे अच्छे व मधुर संबंध थे.

भाजपा और एअाइएडीएमके, दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है. भाजपा तमिलनाडु की राजनीति में अपने पैर जमाना चाहती है. तमिलनाडु की राजनीति दो विचारधाराओं में बंटी हुई है. एआइएडीएमके दक्षिणपंथी विचारों के कारण भाजपा के माकूल है. इसी आधार पर दोनों कई बार सियासी तौर पर एक-दूसरे के करीब आये. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने वाली सरकार में उसने साथ निभाया. इस बार के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में भी भाजपा एआइएडीएमके के साथ चुनावी गंठबंधन चाहती थी. यह बात दीगर है कि ऐसा संभव नहीं हुआ. इसके बाद भी दोनों के बीच निकटता के सूत्र बने रहे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एआइएडीएमके से बेहतर सियासी रिश्ते को आगे बढ़ाने और उसे एनडीए में लाने के ज्यादा इच्छुक रहे हैं. इसी के तहत लोकसभा में उप सभापति का पद एआइडीएमके के नेता दिया गया. वहीं, जब संसद में जीएसटी बिल को पास कराना था, तब एआइएडीएमके ने वाकआउट कर मोदी सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से मदद की थी.

हालांकि, जयललिता और भाजपा के रिश्ते उतरा-चढ़ाव भरे रहे हैं. जब जयललिता सरकार ने शंकराचार्य को गिरफ्तारी कराया था, तब भाजपा ने उनके खिलाफ राजनीतिक मोरचा खोला था. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की 1998 में बनी सरकार भी जयललिताके यू-टर्नलेनेके कारणगिरीथी औरवेसुब्रमण्यनस्वामीकेप्रयासोंआयोजित की गयी एक चाय पार्टी में कांग्रेसअध्यक्ष सोनियागांधी से अपनी नजदीकी बढ़ाने लगी थीं. इन सब के बावजूद वैचारिक रूप से तमिलनाडु में भाजपा के करीब उनकी ही पार्टी रही. जयललिता के नहीं रहने पर इस संबंध को भाजपा सियासी गांठ देना चाहेगी.

दूसरी ओर, एआइडीएमके जयललिता के नहीं रहने से गंभीर दौर से गुजर रहा है. उसके पास अम्मा जैसा कोई चमत्कारी या उनके जैसा व्यापक जनाधार व आभामंडल वाला नेता नहीं है, जिसकी प्रत्यक्ष धमक दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में महसूस की जाये. अम्मा के नहीं रहने पर पार्टी में कोई टूट न हो, यह भी पार्टी की बड़ी चुनौती है. अगर ऐसा होता है, तो न केवल एआइडीएमके को नुकसान होगा, बल्कि भाजपा की भी परेशानी बढ़ेगी.

जानकारों की राय है कि इन सबके अलावा भी तमिलनाडु और एआइएडीएमके में ऐसी परिस्थितियां बनीं है, जो एआइएडीएमके और भाजपा की निकटता की सूत्रधार बनेंगी. तमिलनाडु के नये मुख्यमंत्री पन्नीर सेल्वम पर सरकार को स्थिर रखने और पार्टी में एकजुटता को बनाये रखने की बड़ी जिम्मेदारी है. वहीं, शशिकला को भी पार्टी के अंदर और राज्य की राजनीति में खुद को साबित करना है.शशिकला के लिए जयललिता जैसीसर्वस्वीकार्यता हासिल करना सबसे बड़ीचुनौती होगी. नेतृत्व और दूसरे सियासी सवालों को लेकर पार्टी में टूट न हो और विपक्षी पार्टी के लाभ न मिले, यह इन दोनों की चिंता है. यह परिस्थिति कुल मिला कर भाजपा को लाभ पहुंचा सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जयललिता के अंतिम संस्कार में जाना और अपनी गहरी संवेदना का न केवल शब्दों मेें, बल्कि भावों में भी व्यक्त करना मायने रखता है. प्रधानमंत्री दु:ख की इस घड़ी में एआइएडीएमके के साथ जिस तरह पूरी तरह खड़े दिखे, वह महज औपचारिक नहीं था. जयललिता के अंतिम दर्शन करने के बाद उनके पार्थिव शरीर के पास खड़ी शशिकला के सिर पर हाथ रखना राजनीतिक संबंधों को नये तौर पर परिभाषित करता है.

जानकारों का मानना है कि अम्मा के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी का चेन्नई जाना, राष्ट्रीय शोक का एलान और श्रद्धांजलि के बाद संसद की कार्रवाई को स्थगित करने का एेतिहासिक कदम इस बात के संकेत हैं कि भाजपा जयललिता के बाद के एआइएडीएमके को किस कदर करीब रखना चाहती है.

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