-हरिवंश-
गांधी के प्रियपात्र आपा साहब पटवर्धन, महाराष्ट्र के गांधी कहलाये. महाराष्ट्र की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साधना’ के संपादक रहे. आजादी के बाद दिल्ली में कांग्रेसी नेताओं का सत्ता भूख और पतन देख वह महाराष्ट्र लौट आये. नेहरूजी उन्हें बार-बार केंद्र सरकार में आने के लिए मनाते रहे. लेकिन आपा साहब ने अपने उस समृद्ध और गौरवमय अतीत से आंख मूंद लिया. कई बार नेहरूजी महाराष्ट्र उनके घर मिलने गये, पर वह दिल्ली नहीं लौटे. महाराष्ट्र का गांधी तो दूसरी दुनिया में ही रम चुका था. वह खाने में घी, दूध, मक्खन आदि स्वत: त्याग कर कठिन जीवन आरंभ कर चुके थे.
परिवार का पारंपरिक समृद्धि-वैभव से मुंह मोड़ चुके थे. वह रत्नागिरी के मछुआरों के बीच रम गये थे. उनकी दुनिया बदलने के लिए फिर वहीं आपा साहब ने हरिजनों-भंगियों के बीच काम शुरू किया. महारों के साथ मरे जानवरों को उठा ले जाते. उन्होंने मरे जानवरों को चीरना, चमड़ा निकालना और चप्पलें बनाना आरंभ किया. उनकी जीवन शैली, कार्यपद्धति को आत्मसात कर लिया पूरे महाराष्ट्र में भंगी मुक्ति आंदोलन के वह प्रणता बने. पूज्य अण्णा सहस्त्रबुद्धे ने लिखा, उनका चरित्र तो स्फटिकवत, शुभ्र और पारदर्शी था.
उस रात ऐलिफेंटा गुफा देखने की योजना बनी. चांदनी रात. समुद्र और आदिमयुग की ऐलिफेंटा गुफा, रास्ते में नाव पर राव साहब ने कृष्णमूर्ति एवं अन्य साथियों को शंकराचार्य के श्लोक ‘महेषु मूर्ति’ संस्कृति में गाकर सुनाया. सुंदर और बांधनेवाला स्वर. इसके बाद कृष्णमूर्ति ने पूछा, ‘भारत हर तरह के सृजन के प्रति इतना डेड (मरा हुआ) क्यों है?’भारत के समाज में इसी सृजनता के सौंदर्य को तलाशते-गढ़ते आपा साहब पटवर्धन 1969 में गुजर गये. उसी आपा साहब के छोटे भाई हैं, अच्युत राव पटवर्धन.
