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काला धन मुद्दा, भाजपा की साख दांव पर!

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काला धन मुद्दा, भाजपा की साख दांव पर!

जिस साख और दम के बल पर अभी कुछ महीनें पहले ही भाजपा ने आम चुनाओं में बड़ी जीत हासिल की थी. क्‍या यह ‘कालेधन’ पर सरकार की रूख के बाद लोगों के बीच कम हो जायेगा? एक विश्‍लेषण :-

अरूण जेटली के लिए यह मुश्किल वक्‍त का दौर है, एक तो उनका स्‍वास्‍थ्‍य थोड़े दिनों तक उनके साथ नहीं था फिर जब वह काम पर लौटे तो ‘कालाधन’ उनका इंतजार कर रहा था. (हर बार) मुस्‍कुराते रहने वाले एवं फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाले जेटली को बखुबी पता था क‍ि सरकार के सुप्रीम कोर्ट में कालेधन को लेकर लिए गए Stand से उन्‍हें बाकी दलों से बाद में पहले अपने ही दल में लड़ाई लड़नी है.

Double Taxation का हवाला देकर सरकार ने जब ‘कालाधन’ रखने वाले लोगों के नाम को सार्वजनिक करने में कोर्ट के समक्ष असमर्थतता जाहिर की तो गुस्‍से से तमतमाए राम जेठमलानी ने सरकार की मंशा पर ही प्रश्‍न उठा दिये. हालांकि मुकुल रहतोगी ने प्रेस से बात करते हुए सरकार की मजबूरी को समझाने की कोशिश की. उनके अनुसार अंतरराष्‍ट्रीय संधियों की अवहेलना कर के नाम सार्वजनिक करने की स्थिति में दूसरे देश भारत को सहयोग नहीं करेंगे, जिसका अंत में खामियाजा भारत को ही उठाना पड़ेगा. उन्‍होंने अपने प्रतिवादी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जेठमलानी साहब की नाम सार्वजनिक करने की मांग उनके खुद के कालाधन के खिलाफ चलाए अभियान को नुकसान पहुंचा सकती है.

पर यह सवाल अंतरराष्‍ट्रीय समझौतों पर कोर्ट के हलफनामों से ऊपर का है. मूल प्रश्‍न यह है कि क्‍या भाजपा ने ‘कालाधन’ के मुद्दे का चुनावी लाभ के लिए इस्‍तेमाल किया?

पिछले दस सालों में मनमोहन सरकार के दौरान लोकसभा एवं राज्‍यसभा में आडवाणी, जेटली सहित सभी बड़े नेताओं ने कांग्रेस के ऊपर अंगुली उठायी. उन्‍होंने तीखे शब्‍दों में कांग्रेस नेतृत्‍व को कटघरे में खड़ा करते हुए उनके नेतृत्‍व को कमजोर इच्‍छाशक्ति वाला बतलाया. यहां तक प्रधानमंत्री मोदी ने भी चुनावों के दौरान होनी वाली सभाओं में इस मुद्दे को इस प्रकार उठाया, जिससे यह लगे कि कांग्रेस पार्टी जानबूझ कर ‘कालाधन’ मामलों में सदन एवं कोर्ट में ऐसा Stand ले रही है जिससे कुछ खास लोगों को बचाया जा सके.

अब सवाल यह उठता है कि अगर कांग्रेस नीत सरकार कुछ खास लोगों को बचाने के लिए लोगों के नाम सार्वजनिक करने से हिचकिचा रही थी तो भाजपा नीत सरकार ऐसा क्‍यों कर रही है? नरेंद्र मोदी के लिए इस प्रश्‍न का उत्‍तर जल्‍द से जल्‍द पाना जरुरी है, क्‍योंकि सवाल कोर्ट एवं अंतरराष्‍ट्रीय संधियों का नहीं अपितु उस साख का है जिसपर भरोसा कर भारतीयों ने उन्‍हें प्रचंड बहुमत की सरकार दी है.

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