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Home National पं दीनदयाल उपाध्याय जयंती:राजनीति में ऋषि परंपरा के मनीषी

पं दीनदयाल उपाध्याय जयंती:राजनीति में ऋषि परंपरा के मनीषी

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पं दीनदयाल उपाध्याय जयंती:राजनीति में ऋषि परंपरा के मनीषी

।।विनय कुमार सिंह।।
एकात्म मानववाद के मंत्रद्रष्टा पंडित दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में भारतीय संस्कृति एवं परंपरा के प्रतिनिधि थे. उनका स्थान सनातन भारतीय प्रज्ञा प्रवाह को आगे बढ़ानेवाले प्रज्ञा-पुरुषों में अग्रगण्य है. सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति पंडित उपाध्याय के विचारों में देश की मिट्टी की सुवास को अनुभव किया जा सकता है. वह वास्तव में, राजनीति में ऋषि परंपरा के मनीषी थे.

अत्यंत निर्धन परिवार से होने के बाद भी उन्होंने अपनी योग्यता, प्रतिभा एवं उच्च संस्कारों के बल पर देश के सार्वजनिक जीवन में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था. अंगरेजी कवि बाइरन ने एक जगह लिखा है – So young, so fare, Good without a effort. Great without a foe.अर्थात ‘‘कितने युवा, कितने सुंदर! स्वभाव से ही भले! महान, फिर भी अजातशत्रु!’’ अगर इस कथन के सत्य से साक्षात्कार करना हो, तो वह पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन में किया जा सकता है. गीता में दैवी-संपदा-संपन्न व्यक्ति के जो लक्षण कहे गये हैं, वह उसकी साकार प्रतिमा थे.

वह भारतीय जनसंघ से अवश्य जुड़े रहे, फिर भी दलीय संकीर्णताओं से ऊपर थे. राजनीति उनके लिए साध्य नहीं, समाज सेवा का साधन मात्र थी. अटलजी के अनुसार, ‘‘वह राजनीति का आध्यात्मीकरण चाहते थे. उनकी आस्थाएं प्राचीन अक्षय राष्ट्र जीवन की जड़ों से रस ग्रहण करती थीं, किंतु वह रूढ़िवादी नहीं थे.’’ भारत को समृद्ध, शक्तिशाली व आधुनिक राष्ट्र बनाने की कल्पना लेकर वह चले थे. ‘डॉ लोहिया, डॉ संपूर्णानंद, आचार्य कृपलानी एवं लोकनायक जय प्रकाश नारायण जैसे विभूतियों ने उनके विचारों तथा व्यक्तित्व की मुक्त कंठ सराहना की है.

पंडित दीनदयालजी ने पूंजीवाद, साम्यवाद, मानववाद-अपने समय में प्रचलित सभी वादों का सूक्ष्म अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ये सभी विचार मात्र भौतिकता के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने के चलते अपूर्ण व एकांगी हैं, जिससे जीवन एवं जगत के सामने खड़े प्रश्नों का समाधान असंभव है. पूंजीवाद में अगर व्यक्ति स्वातंत्र्य है, तो वहां आदमी के द्वारा आदमी के शोषण का विकराल चित्र खड़ा है. दूसरी ओर इसकी प्रतिक्रिया में जन्मे मार्क्‍स के साम्यवाद में इस शोषण को मिटा कर आर्थिक समता लाने की बात है, तो वहां व्यक्ति स्वातंत्र्य गायब है. पूंजीवादी शोषण एवं साम्यवादी हिंसा से बचने के लिए प्रसिद्ध विचारक एमएन राय ने मानव को सुखी बनाने के लिए ‘रैडिकल हृयूमैनिज्म’ का विचार दिया तो वह भी मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के समाधान के उपायों तक ही सीमित रहे.

मानव सभ्यता का आधुनिक इतिहास बताता है कि इनमें से कोई भी विचार मनुष्य के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक या वैश्विक प्रश्नों का संतुलित समाधान नहीं सुझा सके. पूंजीवाद अपनी विसंगतियों के चलते सर्वत्र संघर्ष, हिंसा व अशांति को जन्म दे रहा है. वहीं साम्यवाद के दुर्ग एक -एक कर ढह चुके हैं. इस परिस्थिति में पंडित दीनदयालजी का एकात्म मानववाद ही मानव समेत संपूर्ण जीव-जगत को सच्च सुख एवं शांति का रास्ता दिखा सकता है.

एमएन राय के मानववाद पर हामी भरते हुए पंडितजी ने ‘रैडिकल हृयूमैनिज्म’ को संशोधित कर ‘ इंटीग्रल ह्यूमैनिज्म’ पर बल दिया. उन्होंने बताया कि मनुष्य को अगर संपूर्ण सुखी बनाना है तो केवल शरीर ही नहीं, मन, बुद्धि और आत्मा का भी समग्रतापूर्वक विचार करना पड़ेगा. संघर्ष की जगह समन्वय, भौतिकता की जगह आध्यात्मिकता, प्रकृति का शोषण नहीं, विवेकपूर्ण दोहन, सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा दीनदयाल के एकात्म मानववाद के सार तत्व हैं.

उन्होंने शासन द्वारा ऐसी आर्थिक रचना खड़ी करने पर जोर दिया जिसमें ‘उत्पादन में वृद्धि, उपयोग में संयम तथा वितरण में समानता’ की दृष्टि हो. पंडित उपाध्याय के अनुसार सामाजिक-आर्थिक समता क्रूरता के मार्ग से नहीं, मानवीय ममता के भावों को जगा कर लायी जाये तो वह स्थायी होगी. समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को ऊपर लाने के लिए उन्होंने अंत्योदय का सूत्र दिया. ‘अंत्योदय’ के बिंदु पर गांधी, लोहिया व दीनदयाल एक ही जगह खड़े मिलते हैं. वस्तुत: 1916 से 1968 तक की अपेक्षाकृत छोटी जीवन यात्र में उन्होंने चिंतन के जिस विराट को छुआ वह विस्मयकारी है. वह डॉग्मैटिक (किताबी) नहीं, प्रैग्मैटिक (यथार्थवादी) विचारक थे.

वह कुशल संगठक भी थे. 1951 से 1968 तक भारतीय जनसंघ के कई अध्यक्ष रहे, लेकिन अखिल भारतीय महामंत्री के नाते वह पार्टी को वैचारिक दिशा देते रहे. साथ ही साथ कठिन झंझावातों के बीच दल को संभालते भी रहे. पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के आधार पर नयी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक पुनर्रचना खड़ी करना मोदी सरकार तथा भाजपा के अन्य राज्य सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए.
(लेखक झारखंड की भाजपा प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य हैं.)

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