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Home National क्‍यों नौ सितंबर से पहले दिल्‍ली पर भाजपा सरकार लेना चाहती है फैसला?

क्‍यों नौ सितंबर से पहले दिल्‍ली पर भाजपा सरकार लेना चाहती है फैसला?

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क्‍यों नौ सितंबर से पहले दिल्‍ली पर भाजपा सरकार लेना चाहती है फैसला?

नयी दिल्‍ली : दिल्ली के उप राज्यपाल नजीब जंग द्वारा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से सरकार गठन के लिए लिखे गये पत्र के बाद एक बार फिर राजनीतिक पारा चढ़ गया है. जंग ने राष्ट्रपति से सबसे बड़ी पार्टी को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने के लिए अनुमति मांगी है. उप राज्यपाल की इस चिट्ठी के बाद राष्ट्रपति ने केंद्र सरकार से इस उसका पक्ष जानना चाहा है. यानी अगर उप राज्यपाल की मांग को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाती है, तो वे

भाजपा-अकाली गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे.भाजपा-अकाली गठबंधन में फिलहाल 29 विधायक है. इसमें 28 विधायक भाजपा के व एक विधायक शिरोमणि अकाली दल के हैं. भाजपा के तीन विधायक डॉ हर्षवर्धन, रमेश विधूड़ी व प्रवेश वर्मा के लोकसभा चुनाव जीत जाने के बाद उनकी सीटें खाली हो गयी हैं.

70 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 36 विधायक चाहिए. हालांकि विधानसभा की तीन सीटें रिक्त होने के कारण 34 विधायक रहने पर भाजपा सदन में अपना बहुमत साबित कर सकती है. यानी उसे पांच और विधायकों की जरूरत होगी. आम आदमी पार्टी से निकाले गये विधायक विनोद कुमार बिन्नी व एक निर्दलीय विधायक रामवीर शौकीन का समर्थन अगर भाजपा के साथ जोड़ लिया जाये, तो भी उसे चार और विधायकों की जरूरत है. यह संख्या बिना कांग्रेस या आम आदमी के टूटे पूरी नहीं हो सकती. बिन्नी के बाहर जाने के बाद आम आदमी पार्टी के फिलहाल 27 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास आठ विधायक हैं.

हालांकि इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने उप राज्यपाल द्वारा नयी सरकार द्वारा की गयी पहल को असंवैधानिक करार दिया है और राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है. इस बीच गृह मंत्रालय को राष्ट्रपति सचिवालय की चिट्ठी मिलने के बाद भाजपा ने राजनीतिक कवायद तेज कर दी है.

दिल्ली भाजपा के प्रभारी नितिन गडकरी से इस बीच दिल्ली भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्यक्ष व प्रभात झा ने भेंट कर पूरे मामले पर चर्चा की है. मालूम हो कि पांच अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र को इस मामले में पहल करने का निर्देश दिया था.

न्यायमूर्ति एचएल दातू की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने केंद्र को इस मामले में निर्णय लेने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई नौ सितंबर को तय की थी. ऐसे में केंद्र सरकार नौ सितंबर की सुनवाई से पूर्व इस मामले में कोई ठोस पहल करना चाहती है, ताकि वह सरकार गठन कर सके. दिल्ली में 17 फरवरी को अरविंद केजरीवाल द्वारा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद से ही राष्ट्रपति शासन लागू है. ऐसे में वहां नयी सरकार गठन या चुनाव कराने का ही विकल्प बचता है.

* भाजपा क्यों बरत रही है सावधानी

भले ही केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण उसके लिए सरकार गठन का फैसला लेना आसान हो, लेकिन वह इस मामले में सावधानी से कदम बढ़ाना चाहती है. ताकि आम आदमी पार्टी व अरविंद केजरीवाल को यह आरोप लगाने का मौका नहीं मिले की उसने उप राज्यपाल के पद का दुरुपयोग किया और जोड़-तोड़ कर सरकार बनायी. भाजपा को डर है कि केजरीवाल के खास अंदाज में अपना पक्ष जनता के सामने रखने के कारण उसे राजनीतिक नुकसान न हो जाये. ऐसे में अगर वह सरकार गठन नहीं करती है तो विधानसभा भंग कर फिर से चुनाव कराना ही विकल्प बचता है.

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