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बीजेपी संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन या अटल-आडवाणी युग का अंत ?

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बीजेपी संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन या अटल-आडवाणी युग का अंत ?

बीजेपी संसदीय बोर्ड का आज पुर्नगठन किया गया जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को शामिल नहीं किया गया है.

पार्टी ने एक मार्गदर्शक मंडल का गठन किया है, जिनमें अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को जगह दी गयी है. लेकिन इस मंडल में नरेंद्र मोदी व राजनाथ सिंह भी शामिल हैं.तो बोर्ड के पुनर्गठन से लगता है कि अटल-आडवाणी युग का लगभग अंत सा हो गया है.

जो नये मार्गदर्शक मंडल का गठन किया गया है उसमें भी प्रधानमंत्री मोदी व राजनाथ सिंह शामिल हैं. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मार्गदर्शक की भूमिका में भी मोदी व राजनाथ की भूमिका ही महत्वपूर्ण होगी.यह कदम मोदी सरकार से बीजेपी के दिग्गजों को बाहर रखने के बाद अब पार्टी संसदीय बोर्ड को भी 75 की उम्र वाले नेताओं से मुक्त करने के रूप में देखा जा रहा है.

संसदीय बोर्ड क्या है

संसदीय बोर्ड पार्टी का सबसे ताकतवर समूह होता है. पार्टी से जुडी तमाम नीतिगत फैसले संसदीय बोर्ड ही लेती है. पार्टी में किसी को शामिल करना या उससे हटाने संबंधी फैसले भी बोर्ड ही लेता है. पार्टी का अध्यक्ष इस बोर्ड का पदेन अध्यक्ष होता है. इस प्रकार अमित शाह इस बोर्ड के अध्यक्ष बने.

भाजपा का गठन

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन 06 अप्रैल 1980 को हुआ था. अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा की पहली पीढी की शुरुआत हुई. इसमें आगे चलकर मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता भी शामिल हुए. वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की एक अलग पहचान बनी और इनके नेतृत्व में तीन-तीन बार केंद्र में सरकार बनी.

2014 का लोकसभा चुनाव और मोदी की ताजपोशी

2014 के लोकसभा चुनाव के शुरुआत में ही लगा की अटल-आडवाणी युग का लगभग अंत होने वाला है. भाजपा नेताओं के बीच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जनता की मांग के रुप में उभरे और देखते-देखते देश में मोदी लहर छा गया. इस बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर आडवाणी और नरेंद्र मोदी को लेकर भाजपा में मतभेद भी उभरे लेकिन अंततः नरेंद्र मोदी को ही पीएम पद का उम्मीदवार बनाया गया. और मोदी इतिहास रचते हुए भारत के प्रधानमंत्री बने.

अमित शाह का भाजपा अध्यक्ष बनना

मोदी का प्रधानमंत्री बनना और आडवाणी को सरकार में जगह नहीं मिलने के बाद ही यह अटकलें लगनी लगी थी की अब पुराने लोगों को सरकार में जगह नहीं दी जाएगी. इसके बाद अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया. इसमें संघ के कई नये सदस्यों जैसे राम माधव, जेपी नड्डा जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया. किन्तु इन सबके बावजूद पुराने वरिष्ठ नेताओं के लिए एक अच्छी बात थी की पार्टी की सबसे ताकतवर समूह बीजेपी संसदीय बोर्ड में अटल-आडवाणी जोशी जैसे नेता मौजूद थे. लेकिन आज इसके पुनर्गठन ने इस बोर्ड से भी इन नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

मार्गदर्शक मंडल महज एक औपचारिकता !

पार्टी ने उपरोक्त नेताओं को एक वरिष्ठ नेता की तरह सम्मान देने के लिए एक नये समूह मार्गदर्शक मंडल का गठन किया है. हालांकि अभी इस मंडल की भूमिका स्पष्ट नहीं है कि इसकी कार्यशैली क्या होगी और इसकी क्या शक्तियां होगी. लेकिन इस पांच सदस्यीय मंडल में प्रधानमंत्री मोदी व राजनाथ सिंह भी है. ऐसे में आडवाणी और जोशी के विचार को कितना महत्व दिया जाएगा यह देखना होगा.

इन सब के बीच यह बडा प्रश्न है कि क्या मार्गदर्शक मंडल को इतनी शक्तियां दी जाएगी कि यह संसदीय बोर्ड के फैसले पर हस्तक्षेप कर पाएगी या फिर यह केवल एक ऐसे मार्गदर्शक का काम करेगी जिसके मार्गदर्शन पर चलना ना चलना पार्टी की मर्जी पर निर्भर होगा ?

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