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किसी की जागीर नहीं है दिल्ली

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-मुकुंद हरि-

बीजेपी के राज्यसभा सांसद विजय गोयल ने दिल्ली में रहने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को लेकर संसद में विवादित बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि बिहार और यूपी के लोगों को दिल्ली आने से रोकना होगा. इन लोगों की वजह से दिल्ली शहर की मुश्किलें बढ़ रही हैं. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी थोड़े अरसे पहले ऐसा ही बयान दिया था जिसकी सबने आलोचना की थी.

हालांकि, विजय गोयल ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है. वो सिर्फ इतना कहना चाहते थे कि बिहार और यूपी में विकास नहीं होने की वजह से वहां के लोग शिक्षा और आजीविका की तलाश में दिल्ली का रुख करते हैं जिसकी वजह से दिल्ली पर अनावश्यक बोझ पड़ रहा है.

वहां से दिल्ली आये लोग पहले तो झुग्गियां बनाकर रहना शुरू करते हैं और बाद में उन झुग्गियों की जगह अनाधिकृत बस्तियां बन जाती हैं. अगर दिल्ली की समस्याओं को हल करना है तो हमें इन लोगों को दिल्ली आने से रोकना होगा. कांग्रेस समेत सभी मुख्य विपक्षी दलों ने गोयल के बयान की आलोचना की है.

कांग्रेस नेता महाबल मिश्रा ने तो यहां तक कह दिया कि दिल्ली किसी के बाप की नहीं है. गोयल ने राज्यसभा में यह भी कहा कि हर साल पूर्वांचल से करीब 6 लाख प्रवासी आते हैं, जिन्हें वहीं रोका जाना चाहिए.

विजय गोयल की महत्वाकांक्षा

दिल्ली बीजेपी में मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा और साहिब सिंह वर्मा के बाद की पीढ़ी के नेताओं में विजय गोयल और डॉ हर्षवर्धन, ये दो नाम ही ऐसे हैं जिनके भरोसे भाजपा दिल्ली की स्थानीय राजनीति में बनी हुई है. भाजपा के तरकस से साहिब सिंह वर्मा जैसा नायब सिपहसालार खो जाने के बाद विजय गोयल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के दांव चलने शुरू किये.

अपने तीसरे कार्यकाल के दौरान शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की दिल्ली सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे गिरने लगा था, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का अभ्युदय हुआ जिसने महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता की लड़ाई को राजनीति के मैदान में लाने की ठानी. शीला दीक्षित और कांग्रेस से लगातार तीन चुनाव हारने और साहिब सिंह वर्मा जैसे ज़मीनी और लोकप्रिय नेता को खोने के बाद भाजपा की हालत बुरी हो चुकी थी.

कांग्रेस की घटती लोकप्रियता और आम आदमी पार्टी की लगातार बढ़ रही लोकप्रियता के बीच विजय गोयल खुद को जनता का सही शुभचिंतक साबित कर अपनी पार्टी पर ये दबाव बनाने की कोशिश में जुट गये कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उनका नाम सबसे ऊपर रहे. इसके लिए गोयल कभी बिजली की बढ़ी हुई दरों के विरोध में धरना देते हुए तो कभी जनता के सामने मंच पर घडि़याली आंसू बहते दिखे.

जो भी हो, उस वक्त पार्टी में उनकी ये अदाकारी काम आयी और उनका नाम मुख्यमंत्री की दावेदारी के लिए चुन लिया गया. मगर बाद में चुनाव के ऐन पहले भ्रष्टाचार को लेकर अरविंद केजरीवाल के प्रति जनता के अप्रत्याशित समर्थन को देखते हुए विजय गोयल का नाम हटाकर साफ सुथरी छवि के नेता डॉ हर्षवर्धन का नाम घोषित कर दिया गया.

जाहिर है इसका दर्द विजय गोयल को हुआ और दबी जुबान में उनके असंतोष और विलाप की बातें सामने आने लगीं. पार्टी ने उनके असंतोष को दूर करने के लिए उन्हें राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुनकर संसद में भेज दिया.मगर यहां आकर भी उनका लोगों और मीडिया को अपनी ओर आकृष्ट करने की आदत नहीं छूटी और ताज़ा बयां भी उसी कड़ी का एक हिस्सा लगता है.

हरियाणा से आकर दिल्ली में बसा है विजय गोयल का परिवार

विजय गोयल भारत की मूल संवैधानिक व्यवस्था और उसके अंतर्गत इस देश के नागरिकों को मिले मूलभूत अधिकारों के हनन की ऐसी बात कहने से पहले एक बार जरा अपने परिवार के इतिहास पर नज़र दाल लेते तो शायद ऐसी बात बोलने से पहले उन्हें सौ बार सोचना पड़ता.

विजय गोयल के पिता चरती लाल गोयल दिल्ली के पहले विधानसभा-अध्यक्ष रह चुके हैं. सन 1943-44 के दौरान दिल्ली आने के बाद चरती लाल गोयल आरएसएस के सक्रिय सदस्य बन गये. इनका जन्म 1927 में हरियाणा के रोहतक जिले के एक गांव में हुआ था. हरियाणा के ही सोनीपत जिले से मैट्रिक पास करने के बाद चरती लाल गोयल को आगे कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आना पड़ा. यानी, मूलत: विजय गोयल का परिवार खुद हरियाणा से आकर दिल्ली में बसा है और आज वही विजय गोयल पर उपदेश, कुशल बहुतेरे वाली बात कर रहे हैं.

क्या गोयल ये बात भूल गये हैं कि अपने हजारों सालों के इतिहास में दिल्ली कम से कम 11 बार उजड़ चुकी है. हर बार उजड़ने के बाद एक नयी दिल्ली बसी है जिसे कभी हस्तिनापुर तो कभी इंद्रप्रस्थ और आज के दौर में दिल्ली या नयी दिल्ली का नाम मिला हुआ है. यहां आकर बसने वालों में एक तरफ गुर्जर और जाट हैं तो वहीं दूसरी तरफ बिहार और यूपी के लोगों के अलावा राजस्थानी, पंजाबी और सिंधी लोग भी हैं. इसके अलावा भारत विभाजन के दंश को झेलने वाले लाखों रिफ्यूजी परिवारों को भी इसी दिल्ली ने अपनाया और बसाया है.

अगर प्रवासियों के आने से इतनी परेशानी की बात है तो भारत-पाकस्तिान के बंटवारे के बाद दिल्ली आये उन हजारों शरणार्थियों के बारे में गोयल साहब क्या कहना चाहेंगे जिनको सरकार ने खुद जमीन और आजीविका मुहैया करवाई ताकि उनके सिर पर छत मिल सके.

क्या दिल्ली के राज ठाकरे बनना चाहते हैं गोयल !

गोयल साहब की बात का रुख महाराष्ट्र में मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे के जैसा लगता है. लेकिन गोयल भूल रहे हैं कि चाहे दिल्ली हो या महाराष्ट्र बिना बिहार और यूपी के लोगों के आज उन राज्यों का विकास इतना बेहतर नहीं हो पाता, जैसा आज दिख रहा है. अकेले दिल्ली शहर से अगर बिहार और यूपी के लोग हट जायें तो समूची दिल्ली की आर्थिक हालत चरमरा जायेगी और वहां के बाज़ार, धंधे, उद्योग, निर्माण, शिक्षा से लेकर रोजगार तक के क्षेत्रों की इतनी बुरी हालत हो जायेगी कि उसे संभालना किसी भी सरकार के लिए बूते से बाहर हो जायेगा.

पीएम की कुर्सी पर बिहार और यूपी का असर

अगर बात लोकसभा की करें तो ये दोनों प्रदेश इतने सक्षम हैं कि दिल्ली में बनने वाली सरकार में अकेले ये दोनों राज्य ही 120 सीटों का सहयोग देते हैं. कहावत भी है कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता बिना यूपी और बिहार से गुजरे तय नहीं हो सकता.

जिस यूपी और बिहार के लोगों पर गोयल अंगुली उठा रहे हैं, उसी राज्य की करोड़ों की आबादी ने केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनाने में सबसे अहम योगदान दिया है. बिहार और यूपी की जनता के सामने झोली फैलाने आये नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी को इन दोनों पिछड़े और गरीब राज्यों ने 100 से भी ज्यादा सीटें देकर मोदी की सरकार बनने का भाजपा का सपना पूरा किया. आज विजय गोयल उन्हीं राज्यों की जनता के लिए कृतज्ञता जताने की बजाय उस पर अंगुली उठा रहे हैं.इसके अलावा दिल्ली की राजनीति में इन प्रवासियों का बोलबाला इस कदर है कि बिना इनके सहयोग के दिल्ली की विधानसभा में कोई सरकार नहीं बन सकती.

विजय गोयल भूल रहे हैं कि उनका ये बयान ना-काबिले माफी है और खुद उनकी ही पार्टी और उसके सदस्यों के साथ-साथ पीएम मोदी का सर भी गोयल की वजह से बिहार और यूपी के लोगों के सामने झुक जायेगा.जनता ही लोकतंत्र की असली मालिक होती है. इसलिए, बेहतर यही होगा कि वक्त रहते नेतागण ऐसी संकीर्ण मानसिकता से उबर जायें वरना कहीं ऐसा न हो जाये कि जिस जनता ने आज भाजपा को अर्श पर पहुंचाया है वही कल विजय गोयल जैसे लोगों की वजह से वापस उसे फर्श पर लिटा दे.

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