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चंद्रयान-2 के यहां तक पहुंचने में देश की मिट्टी का अहम योगदान

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चंद्रयान-2 के यहां तक पहुंचने में देश की मिट्टी का अहम योगदान

बेंगलुरु : चंद्रयान-2 के इस मुकाम तक पहुंचने में देश की मिट्टी का कमाल है. दरअसल, चंद्रयान-2 के लैंडर यानि वो भाग जो चंद्रमा की सतह पर उतर कर खोजबीन करेगा, उसको चंद्रमा की सतह पर उतारने के लिए चंद्रमा जैसी मिट्टी पर अभ्यास करना जरूरी था.

इसरो ने वैसी मिट्टी की तलाश की, तो पता चला कि नासा के पास मिल जायेगी, लेकिन नासा ने उस मिट्टी के लिए एक किलोग्राम की कीमत 10 हजार रुपये मांगी. चंद्रयान-2 के लिए 60 टन मिट्टी की जरूरत थी. इसके बाद इसरो को तमिलनाडु में सलेम के पास नामक्कल जिले के सीतमपोंडी और कुन्नामलाई गांवों में वो एनॉर्थोसाइट चट्टानें मिल गयीं, जो चंद्रमा की मिट्टी से 90 प्रतिशत मिलती-जुलती है. चट्टानों को पीस कर चांद की मिट्टी की तरह बनायी गयी. जो काम करोड़ों में होना था, उसे महज 12 लाख रुपये में पूरा कर लिया गया.

मिशन चंद्रयान-2 के लिए सिर्फ देश की मिट्टी का ही इस्तेमाल नहीं हुआ है, स्पेशल क्वालिटी के स्टील भी देश में ही तैयार किये गये हैं. तमिलनाडु के सेलम में स्टील ऑथोरिटी ऑफ इंडिया के प्लांट में स्पेशल क्वालिटी का स्टील तैयार किया गया है. स्टील शीट का इस्तेमाल चंद्रयान-2 के क्रायोजनिक इंजन में किया गया है. पहली बार रूसी ग्रेड का ऑस्टेनेटिक स्टैबलाइज्ड स्टेनलेस स्टील देश में तैयार किया गया है. स्टील की क्वालिटी ऐसी है, जो अंतरिक्ष में हर चुनौती का सामना करने में सक्षम है.

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