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जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों से निपटने को तैयार है भारत : हरिवंश

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जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों से निपटने को तैयार है भारत : हरिवंश

– दक्षिण-एशियाई देशों की संसदों के अध्यक्षों के चौथे शिखर सम्मेलन में बोले उपसभापति

ब्यूरो, नयी दिल्ली

वैश्विक तौर पर जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, नदियों और झीलों की जमी हुई बर्फ पिघल रही है, वनस्पति और जीव-जंतुओं के क्षेत्र बदल चुके हैं और पेड़ों पर फूल समय से पहले खिल रहे हैं. वैश्विक जलवायु परिवर्तन को लेकर किये गये वैज्ञानिक पूर्वानुमान सही साबित हो रहे हैं.

जिस तेजी से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, लंबे समय तक अत्यधिक गर्म लू चल रही है, बाढ़ और भूस्खलन का कारण बनने वाली मूसलाधार बारिश और अन्य स्थितियों के हम सब पर पड़ने वाले प्रभाव को स्पष्ट रूप देखा जा सकता है. ऐसे में मानव जीवन को और अधिक होने वाली हानि से बचाने के लिए सभी को एकजुट होकर वैश्विक स्तर पर कदम उठाने होंगे.

मालदीव में आयोजित अंतर संसदीय संघ के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने संबंधी दक्षिण एशियाई देशों की संसदों के अध्यक्षों के चौथे शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने ये बातें कही.

उपसभापति जलवायु परिवर्तन संबंधी वैश्विक एजेंडे को बढ़ावा देने एवं पेरिस समझौते को लागू करने संबंधी चुनौतियों से निपटने के बारे में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कई विकसित देशों और चीन से कम है, फिर भी भारत जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बड़े कदम उठा रहा है.

भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन संबंधी मुद्दों का समाधान करने के लिए जून 2008 में जलवायु परिवर्तन संबंधी राष्ट्रीय कार्य योजना की भी शुरूआत की थी. इस योजना में सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल, कृषि, हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र, सतत पर्यावास, हरित भारत और जलवायु परिवर्तन संबंधी विशेष जानकारी के विशिष्ट क्षेत्रों से संबंधित आठ मिशन शामिल किये गये हैं.

उन्होंने सतत विकास लक्ष्य के एजेंडे को आगे ले जाने के लिए भारत की संसद द्वारा गरीबी उन्मूलन, महिला-पुरुष समानता को बढ़ावा देने तथा जलवायु परिवर्तन को रोकने संबंधी नीतियों एवं योजना संदर्शों का विकास करने संबंधी योगदान का भी जिक्र किया.

भारत सहित विकासशील देशों के लिए चिंता का विषय यह रहा है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों के प्रभावी कार्यान्यन के लिए पर्याप्त और संभावित वित्त, प्रौद्योगिकीय हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के संबंध में विकसित देशों से मिलने वाली सहायता किस प्राकर हासिल हो. मालदीव में आयोजित दक्षिण-एशियाई देशों की संसदों के अध्यक्षों के चौथे शिखर सम्मेलन 1-2 सितंबर तक चला.

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