दिल्ली में चुनाव से घबरा रही है भाजपा!

नयी दिल्लीः दिल्ली में भाजपा की सरकार बनाने की कवायदतेज हो गयी है. कल तक सरकार बनाने की अटकलों से किनारा करने के बाद आज बीजेपी के एक विधायक रामबीर विधूडी ने दावा किया है उसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त आंकडे हैं.... गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं. इसमें […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | July 17, 2014 4:09 PM

नयी दिल्लीः दिल्ली में भाजपा की सरकार बनाने की कवायदतेज हो गयी है. कल तक सरकार बनाने की अटकलों से किनारा करने के बाद आज बीजेपी के एक विधायक रामबीर विधूडी ने दावा किया है उसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त आंकडे हैं.

गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा में कुल 70 सीटें हैं. इसमें से 28 सीटें आम आदमी पार्टी के पास है. 8 सीट कांग्रेस के पास है. 2 अन्य के पास और बाकी 32 भाजपा के पास है.

दिल्ली में सरकार बनाने के लिए 36 विधायकों का आंकड़ा होना जरुरी है. अब भाजपा दावा कर रही है कि उसके पास सरकार बनाने के लिए प्रयाप्त आंकड़े हैं. तो जाहिर है कि या तो वह आम आदमी पार्टी से समर्थन लेगी या फिर कांग्रेस से. अब यह तो स्पष्ट है कि आप भाजपा से गठबंधन नहीं कर सकती. तो फिर जाहिर है कि भाजपा का कांग्रेस से ही कुछ तालमेल हुआ होगा जिसकी बदौलत वह दावा कर रही है कि उसके पास सरकार बनाने के लिए प्रयाप्त आंकडें हैं. जबकि कांग्रेस भी औपचारिक तौर पर यह कह रही है कि वह किसी को समर्थन देनी वाली नहीं है.

अब यहां सवाल यह है कि इतने अटकलों के बावजूद भाजपा दिल्ली में फिर से चुनाव क्यों नहीं चाह रही है. वह क्यों कह रही है कि उसके पास प्रयाप्त आंकडें हैं और वह सरकार बनाने के लिए तैयार है. विश्लेषकों के अनुसार देखा जाय तो कुछ ऐसे कारण हैं जिसके कारण भाजपा दिल्ली में तत्काल चुनाव से भाग रही है. आइए डालते हैं इस पर एक नजर-

लोकसभा चुनाव में भारी विजय के बाद भी भाजपा के पास दिखाने के लिए कुछ नहीं है

यह सही है कि इस साल लोकसभा चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत मिला है. लेकिन सरकार बनने के बाद से भाजपा के पास ऐसा दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है जिसके दावे के आधार पर वह दिल्ली में मतदाताओं से वोट मांग सके. रेल भाड़े में वृद्धि, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में वृद्धि, लगातार बढ़ती महंगाई, दिल्ली में बिजली की बढ़ती कीमतें आदि कई कारण हैं जिसके कारण भाजपा दिल्ली में जनता के सामने जाने से ड़र रही है. जानकारों का मानना है कि अभी तक लगभग दो महीने में सरकार के पास वैसी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है जिसके आधार पर दिल्ली में वह चुनाव लड सके.

केजरीवाल भाजपा के समक्ष अभी भी बड़ी चुनौती

लोकसभा चुनाव में हालांकि आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरुप नहीं रहा. इसके लिए केजरीवाल की नीति को ही जिम्मेदार बताया गया. किन्तु विश्लेषकों के अनुसार इसके बावजूद केजरीवाल की दिल्ली में पकड़ ढीली नहीं हुई है. लोकसभा चुनाव में भले ही आप को केवल चार सीटें मिली पर प्रतिशत के तौर पर देखा जाय तो केजरीवाल का वोट प्रतिशत 3 फीसदी बढ़ा है. इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को दरकिनार कर दिया है. दूसरी ओर केजरीवाल की मुहल्ला कमिटी अभी भी बेहतर ढंग से कार्य कर रही है और केजरीवाल को उस कमिटी का भरपूर समर्थन प्राप्त है. यह बात भाजपा भी मानती है कि अगर चुनाव होती है तो केजरीवाल भाजपा के लिए फिर चुनौती बन सकते हैं

दिल्ली की स्थानीय समस्याएं बरकरार

चाहे जिस रुप में हो लेकिन आम आदमी पार्टी ने आते ही दिल्ली में बिजली पानी के दाम में कमी कर दी थी. इससे तत्काल रुप में जनता के समक्ष केजरीवाल की सकारात्मक छवि बनी थी. क्योंकि मतदाता में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो लोंग टर्म रिलीफ न चाहकर तत्काल रिलीफ चाहता है. ऐसे में दिल्ली में बिजली के दाम में लगातार बढती कीमत भाजपा के लिए मुसीबत बन सकती है.

हर्षवर्धन के बाद केजरीवाल के मुकाबले वैसा बड़ा चेहरा नहीं

दिल्ली में केजरीवाल के मुकाबले में हर्षवर्धन एक बड़ा चेहरा था जिनकी दिल्ली में जनता के बीच पैठ थी. किन्तु हर्षवर्धनकेकेंद्र में चले जाने के बाद केजरीवाल के मुकाबले कोई बडा नेता नहीं है. जगदीश मुखी, विजय गोयल, विजेंद्र गुप्ता, मीनाक्षी लेखी, सतीश उपाध्याय जैसे नेता हैं लेकिन जनता के बीच अभी उनकी उस तरह पैठ नहीं है जैसी बीजेपी में हर्षवर्धन की थी और कांग्रेस में शीला दीक्षीत की.

फिर से त्रिशंकु विधानसभा का डर

एक तरफजहां केजरीवाल से भाजपा को डर है वहीं एक डर कांग्रेस से भी है. पिछले डेढ़ दो महीनों में रेल भाड़े, तेल वृद्धि, वेद प्रताप वैदिक प्रकरण, डीयू-यूजीसी विवाद आदि को लेकर जिस तरह से विपक्ष ने भाजपा सरकार को घेरा है उसको लेकर कांग्रेस से भी उसकी चुनौती है. मिला- जुलाकर भाजपा को डर है कि अगर किसी को स्पष्ट जनाधार नहीं भी मिला तो कम-से-कम फिर त्रिशंकु विधानसभा के आसार बन सकते हैं. ऐसे में भाजपा चाहती है कि उसकी लोकसभा में बनी छवि बरकरार रहे और दिल्ली में उसकी सरकार भीबन जाए.