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42 साल में पहली बार चंद्रशेखर कुनबा चुनाव से बाहर

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42 साल में पहली बार चंद्रशेखर कुनबा चुनाव से बाहर
अजीत पांडेय
पिता की मौत के बाद बेटे नीरज ने उनकी पार्टी सजपा का सपा में विलय किया
पूर्वांचल के बागी बलिया की पहचान रहे पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने लंबे समय तक राज किया. वह 37 साल में बलिया से नौ बार चुनाव लड़े और आठ बार सांसद बने.
वर्ष 1977 के बाद हुए सभी चुनाव जीते, मात्र एक बार 1984 में वह इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर में कांग्रेस के जगन्नाथ चौधरी से हारे. 2007 में उनके निधन के बाद उनके छोटे बेटे नीरज शेखर ने पिता की पार्टी सजपा (समाजवादी जनता पार्टी) का सपा में विलय कर लिया. उसके बाद हुए उपचुनाव और 2009 के चुनाव में जीत हासिल की, लेकिन 2014 में मोदी लहर में पहली बार बलिया में कमल खिला.
पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री भरत सिंह सांसद बने. नीरज बड़े अंतर से चुनाव हारे, लेकिन सपा नेतृत्व के करीबी होने और पिता के नाम के कारण अखिलेश यादव ने उन्हें राज्यसभा भेजा. वह क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे. सपा परिवार में बिखराव के समय वह अखिलेश और रामगोपाल के साथ खड़े रहे. कहा जा रहा है कि 2019 के चुनाव में पत्नी डॉ सुषमा शेखर के लिए वह टिकट चाहते थे. उसके लिए काफी प्रयास भी किया.
राजनीतिक हलकों में यह माना भी जा रहा था कि उन्हें या उनकी पत्नी को टिकट मिलेगा. दावेदारों की अधिकता के कारण सपा नेतृत्व भी पसोपेश में थी. इसलिए नाम की घोषणा चुनाव के मात्र 21 दिन पहले 28 अप्रैल की देर शाम की गयी. तब नामांकन का अंतिम दिन शेष था. टिकट मिला पूर्व विधायक सनातन पांडेय को. सनातन पांडेय 2007 में सपा के विधायक बने थे. 2016 में मंत्री का ओहदा मिला था. सनातन के नाम की घोषणा के बाद से ही नीरज के पैतृक आवास इब्राहिम पट्टी में मायूसी छा गयी. बताया जा रहा है कि नीरज टिकट की घोषणा के बाद लखनऊ जाने के क्रम में आधे रास्ते से लौट गये थे.
भतीजे रविशंकर भी राजनीति में सक्रिय
चंद्रशेखर के भतीजे रविशंकर सिंह भी राजनीति में सक्रिय हैं. वर्ष 2014 में उन्होंने बलिया के दूसरे लोकसभा क्षेत्र सलेमपुर से बसपा के बैनरतले चुनाव लड़ा था, लेकिन कामयाब नहीं हो सके. फिलहाल वह सपा से विधान परिषद सदस्य हैं. रविशंकर सिंह लंबे समय तक बसपा से भी जुड़े रहे हैं.
… तो इसलिए नहीं मिला टिकट!
नीरज की राज्यसभा की सदस्यता अभी दो-तीन साल बची हुई है. ऐसे में अगर उन्हें टिकट दिया जाता और वह जीत जाते, तो उनके द्वारा खाली की गयी राज्यसभा सीट भाजपा छीन सकती थी, क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा का बहुमत है. दूसरी वजह यह बतायी जा रही है कि उनके सांसद रहते उनकी पत्नी को टिकट देना कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफी होती.
जातीय फैक्टर
भदोही के सांसद और किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह मस्त इस बार भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा के परंपरागत वोटर राजपूत और भूमिहार उनका एकमुश्त समर्थन कर सकते हैं. लिहाजा सपा ने ब्राह्मण वोटरों को साधने के लिए सनातन पर दांव आजमाया है. उसे उम्मीद है, इससे ब्राह्मण वोटों का बिखराव रुकेगा. साथ ही यादव, मुस्लिम और दलितों के परंपरागत वोट भी मिल जायेंगे और यहां उसकी जीत आसान हो जायेगी.
स्टार प्रचारकों में भी नीरज नहीं
नीरज शेखर कभी सपा सुप्रीमो के करीब हुआ करते थे, लेकिन टिकट कटने के बाद पार्टी से दूरी बना कर चल रहे नीरज को पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची में स्थान नहीं दिया गया, जबकि पड़ोस के गाजीपुर के पूर्व मंत्री ओपी सिंह का नाम है. इसके भी अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं.
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