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साथ ही सरकार ने दावा किया कि कानून बनने के बाद यह न्यायिक समीक्षा की अग्निपरीक्षा में भी खरा उतरेगा, क्योंकि इसे संविधान संशोधन के जरिये लाया गया है. इस विधेयक के तहत सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को शिक्षा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रावधान है. केंद्रीय कैबिनेट ने सोमवार को ही इसे मंजूरी प्रदान की थी. विधेयक पर हुई चर्चा में कांग्रेस, सपा सहित विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा इस विधेयक का समर्थन करने के बावजूद इसे जल्दबाजी में किया गया फैसला बताया. आरोप था कि सरकार इस विधेयक को लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर लायी है. इस पर सरकार ने कहा- आप इस बिल का समर्थन कर ही रहे हैं, तो आधे मन से नहीं, पूरे दिल से कीजिए.
लोकसभा में केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने विधेयक पर सदन में पांच घंटे तक हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि यह फैसला ‘सबका साथ, सबका विकास’ की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है. यह विधेयक अमीरी व गरीबी की खाई को कम करेगा. लाखों परिवारों को लाभ होगा. इससे सामान्य वर्ग सभी कमजोर लोगों को लाभ होगा, चाहे वह किसी वर्ग या धर्म के हों. इस विधेयक पर लोकसभा में शाम पांच बजे से रात दस बजे तक लगातार चर्चा हुई. अन्नाद्रमुक के एम थंबिदुरै, आइयूएमएल के इटी मोहम्मद बशीर और एआइएमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक का विरोध किया था.
गहलोत ने विपक्ष की उस आशंकाओं को निराधार बताया कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा है, तो यह कैसे संभव होगा? उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की नीति और नीयत साफ है. इसलिए संविधान में प्रावधान करने के बाद आरक्षण देने का काम सरकार करेगी. ऐसे में यह प्रावधान कोर्ट में निरस्त होने की बात में दम नहीं है. तत्कालीन राव सरकार ने संवैधानिक प्रावधान के बिना 10 प्रतिशत आरक्षण का आदेश जारी किया था, इसलिए टिक नहीं सका. इस दौरान सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे.
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