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जयंती : इसलिए लोगों के दिलों में बसते थे समाजसेवी बाबा आमटे

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जयंती  : इसलिए लोगों के दिलों में बसते थे समाजसेवी बाबा आमटे

नयी दिल्ली : बाबा आमटे यानी डॉ॰ मुरलीधर देवीदास आमटे की आज जयंती है. इस अवसर पर गूगट ने डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है. आमटे का जन्म 26 दिसंबर 1914 को हुआ था और उन्होंने 9 फरवरी 2008 को अंतिम सांस ली. 94 साल की आयु में उनका निधन हो गया था. वे भारत के प्रमुख व सम्मानित समाजसेवी थे.

महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट शहर में जन्मे बाबा आमटे के पिता का नाम देविदास आमटे और उनकी माता का नाम लक्ष्मीबाई आमटे था. उनका परिवार एक संपन्न परिवार था. उनके पिता ब्रिटिश गवर्नमेंट ऑफिसर थे, उनके ऊपर डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन और रेवेन्यु कलेक्शन की जिम्मेदारी थी. बचपन में ही मुरलीधर को अपना उपनाम बाबा दिया गया था. यहां चर्चा कर दें कि उन्हें बाबा इसलिए नही कहा जाता था कि वे कोई संत या महात्मा थे, बल्कि उन्हें इसलिए बाबा इसलिए लोग पुकारते थे क्योंकि उनके माता-पिता ही बचपन में उन्हें इस नाम से संबोधित करते थे.

कानून विषय पर उन्होंने वर्धा में खास अध्‍यन कर रखा था. वे भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जल्द ही शामिल हो गये थे. उन्होंने भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका अदा की. भारतीय स्वतंत्रता नेताओ के लिए वे बचावपक्ष वकील की भूमिका में नजर आते थे. 1942 के भारत छोडो आन्दोलन में जिन भारतीय नेताओ को ब्रिटिश सरकार ने कारावास में डाला था उन सभी नेताओ का बचाव बाबा आमटे ने करने का काम किया था. इसके बाद थोडा वक्त उन्होंने महात्मा गाँधी के सेवाग्राम आश्रम में बिताया और गांधीवाद के अनुयायी के रुप में आगे का जीवन व्य‍तीत करने लगे.

आमटे की एक बात सभी के जेहन में याद आती है. उन्होंने ब्रिटिश सैनिको से एक लड़की की जान बचायी जिसके बाद गांधी जी उनके मुरीद हो गये. इस घटना के बाद गांधी जी आमटे को “अभय साधक” का नाम दिया. उन दिनों कुष्ट रूप समाज में तेज़ी से फ़ैल रहा था और बहुत से लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे थे. लोगो में ऐसी ग़लतफ़हमी घर कर गयी थी कि यह बीमारी जानलेवा है. ऐसे वक्त में आमटे ने लोगो की इस ग़लतफ़हमी को दूर किया और कुष्ट रोग से प्रभावित मरीज के इलाज की उन्होंने काफी कोशिशे भी की.

आमटे ने गरीबो की सेवा और उनके सशक्तिकरण और उनके इलाज के लिए भारत के महाराष्ट्र में तीन आश्रम की स्थापना करने का भी काम किया. 15 अगस्त 1949 की बात करें तो इस दिन उन्होंने आनंदवन में एक पेड़ के नीचे अस्पताल की शुरुआत भी की. उन्होंने अपने जीवन को बहुत से सामाजिक कार्यो में न्योछावर किया, इनमे मुख्य रूप से लोगो में सामाजिक एकता की भावना को जागृत करना, जानवरों का शिकार करने से लोगो को रोकना और नर्मदा बचाओ आन्दोलन शामिल है.

सन 1985 में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन भी चलाया था. इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था. आमटे के कार्यो को देखते हुए 1971 में उन्हें पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया.

प्राप्त अवार्ड–

-अमेरिका का डेमियन डट्टन पुरस्कार 1983 में दिया गया. इसे कुष्ठ रोग के क्षेत्र में कार्य के लिए दिया जाने वाल सर्वोच्च सम्मान समझा जाता है.

-एशिया का नोबल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमन मैगसेसे (फिलीपीन) से 1985 में अलंकृत किया गया.

-मानवता के लिए किए गए अतुलनीय योगदान के लिए 1988 में घनश्यामदास बिड़ला अंतरराष्ट्रीय सम्मान दिया गया.

-मानवाधिकार के क्षेत्र में दिए गए योगदान के लिए 1988 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार सम्मान दिया गया.

-1990 में 8,84,000 अमेरिकी डॉलर का टेम्पलटन पुरस्कार दिया गया. धर्म के क्षेत्र का नोबल पुरस्कार नाम से मशहूर इस पुरस्कार में विश्व में सबसे अधिक धन राशि दी जाती है.

-पर्यावरण के लिए किए गए योगदान के लिए 1991 में ग्लोबल 500 संयुक्त राष्ट्र सम्मान से नवाजा गया.

-स्वीडन ने 1992 में राइट लाइवलीहुड सम्मान.

-भारत सरकार ने 1971 में पद्मश्री से नवाजा.

-1986 में पद्मभूषण.

-1985-86 में पूना विश्वविद्यालय ने डी-लिट उपाधि

-1980 में नागपुर विश्वविद्यालय ने डी-लिट उपाधि

-1979 में जमनालाल बजाज सम्मान.

-2004 के महाराष्ट्र भूषण सम्मान देने की घोषणा. महाराष्ट्र सरकार के यह सर्वोच्च सम्मान उन्हें एक मई 2005 में आनंदवन में दिया गया.

-1999 में गाँधी शांति पुरस्कार

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