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Home National उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताना हिंदू राष्ट्रवादियों का दुष्प्रचार : मेघनाद देसाई

उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताना हिंदू राष्ट्रवादियों का दुष्प्रचार : मेघनाद देसाई

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उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताना हिंदू राष्ट्रवादियों का दुष्प्रचार : मेघनाद देसाई

मुंबई : ब्रिटेन के नेता एवं अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई ने उर्दू के उत्तर भारतीय भाषा होने पर जोर दिया है और इसे इस्लाम से जोड़ने को लेकर हिंदू राष्ट्रवादियों की आलोचना भी की है. इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज करने सहित उत्तर प्रदेश में कुछ स्थानों का नाम परिवर्तन करने जैसे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कदम उठाने के बीच उनकी यह टिप्पणी आयी है.

देसाई ने कहा, ‘उर्दू मुस्लिम की भाषा नहीं है. यह एक उत्तर भारतीय भाषा है. उर्दू को मुस्लिम की भाषा बताना कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों का दुष्प्रचार है.’ उन्होंने इस रवैये के उदाहरण के तौर पर शहरों के नाम में किये गये बदलाव का भी जिक्र किया.

उन्होंने कहा कि मुसलमानों के प्रति अधिकांश दुर्भावना विभाजन के नतीजों को लेकर है, जिसकी यादें अभी मिटी नहीं हैं. देसाई ने राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की हिफाजत करने के लिए पर्याप्त कार्य नहीं करने को लेकर कांग्रेस की भी आलोचना की.

उन्होंने कहा कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक कद्दावर शख्सीयत थे, जो लोगों को लामबंद कर सकते थे और उन्हें धर्मनिरपेक्ष बना सकते थे, लेकिन परवर्ती कांग्रेस सरकारें इस मोर्चे पर नाकाम रहीं. उन्होंने कहा, ‘‘…कांग्रेस ने राष्ट्र को विभाजन को भूलने के लिए कहने में और हमें धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ कोशिश की.’

ऐसा प्रतीत होता है कि वह कहना चाहते हैं कि कथित तौर पर गोमांस खाने को लेकर सितंबर, 2015 में हुई मोहम्मद अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या जैसी घटनाओं का ज्यादा मतलब निकालने की जरूरत नहीं है. उन्होंने भरोसा जताया कि हमारा लोकतंत्र यह सुनिश्चित करेगा कि इस तरह की प्रवृत्तियों पर रोक लगे.

उन्होंने कहा कि यदि आप सत्ता में आना चाहते हैं, तो किसी वोट बैंक को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं, क्योंकि हमारे लोकतंत्र की यह मजबूती है कि हर वोट मायने रखता है. उन्होंने कहा, ‘मैं इस पर आशावादी हूं.’ देसाई ने कहा कि कोई भी ‘बहुसंख्यकवाद’ इस देश की स्थायी विशेषता के रूप में पुष्पित पल्लवित नहीं हो सकता और इस तरह की प्रवृत्तियों पर रोक लगेगी.

गौरतलब है कि बहुसंख्यकवाद के तहत आबादी का बहुसंख्यक हिस्सा (कभी-कभी इसे धर्म, भाषा, सामाजिक वर्ग या पहचान कराने वाली विशेषताओं के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है) समाज में एक तय सीमा तक सर्वोच्चता पाने का हकदार होता है और उसे ऐसे फैसले करने का अधिकार होता है, जो समाज को प्रभावित करता हो.

देसाई ने कहा कि राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी है कि वे अन्य धर्मों की उपेक्षा कर सिर्फ एक धर्म को बढ़ावा नहीं दें, जैसा कि यूरोप में हुआ है. यहां पिछले तीन साल से ‘मेघनाद देसाई एकेडमी ऑफ इकोनॉमिक्स’ संचालित करने वाले देसाई ने कहा कि चीजों के नाम महज इसलिए नहीं बदल देना चाहिए कि उसका पहले का प्रारूप मौजूदा प्रशासन के लिए असहज है.

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