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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा आईआरसीटीसी घोटाला मामला

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लालू परिवार को बचाने के लिए सीबीआई के निदेशकों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए एसआईटी जांच की मांग

नयी दिल्ली : आईआरसीटीसी घोटाले का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. लालू और उनके परिवार के खिलाफ शिकायतकर्ता वेंकटेश प्रसाद शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग पर जांच में राजद प्रमुख लालू प्रसाद और उनके परिवार को बचाने का आरोप लगाते हुए माैजूद साक्ष्य के आधार पर इस मामले में एसआईटी जांच की मांग की गयी है. साथ ही सीबीआई, सीवीसी और प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुखों की कार्यअवधि दो साल तय करने के अदालत के आदेश पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया है. वेंकटेश प्रसाद शर्मा के वकील गोपाल सिंह ने दायर याचिका में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 32 में मौलिक अधिकारों की व्याख्या की गयी है.
विनीत नारायण मामले में सुप्रीम काेर्ट ने मुख्य सतर्कता आयुक्त, सीबीआई डायरेक्टर की कार्यअवधि तय की थी ताकि मामले की निष्पक्ष जांच की जा सके. लेकिन कोर्ट के आदेश की अनदेखी लगभग सभी सीबीआई प्रमुखों ने की है. याचिका में कहा गया है कि सीबीआई के कई पूर्व प्रमुखों ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और उनके परिवार को भ्रष्टाचार के मामले में बचाने की कोशिश की है. याचिका में दावा किया गया है कि याचिकाकर्ता का इस मासले में अपना कोई स्वार्थ नहीं है और जनहित को देखते हुए उसने जान पर खेलकर साक्ष्य जुटाये हैं. पूर्व मुख्यमंत्री और परिवार के खिलाफ अवैध तरीके से संपत्ति अर्जित करने के सारे साक्ष्य 17 अप्रैल को सीबीआई को दिये गये. तमाम साक्ष्य के बावजूद सीबीआई ने व्यापक जांच की बजाय प्रारंभिक जांच शुरू की.
पूर्व सीबीआई निदेशकों की भूमिका संदिग्ध : याचिका में कहा गया है कि मुख्य सतर्कता आयुक्त का काम शिकायत की जांच के लिए सीबीआई को भेजना होता है. लेकिन आईआरसीटीसी मामले में सीवीसी ने शिकायत पर काफी समय पर कार्रवाई नहीं की. शिकायत भेजे जाने के बाद सीबीआई के निदेशक रहे एपी सिंह, रंजीत सिन्हा और अनिल सिन्हा ने इस मामले पर ठोस कार्रवाई नहीं की. सीबीआई के पूर्व निदेशक एपी सिंह की मीट कारोबारी के साथ संदिग्ध संबंधों की जानकारी पूरे देश को है. सिंह ने रंजीत सिन्हा को निदेशक बनाये जाने के समय चयन समिति के सामने महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी.
जबकि चारा घोटाले में रंजीत सिन्हा की भूमिका को लेकर पटना हाईकोर्ट सवाल उठा चुका था. रंजीत सिन्हा के बाद सीबीआई निदेशक बने अनिल सिन्हा कभी जांच को लेकर गंभीर नहीं रहे. मौजूदा निदेशक आलोक वर्मा भी पुराने ढर्रे पर आगे बढ़ रहे हैं और प्रभावशाली नेताओं को बचाने की कोशिशें लगातार जारी हैं. चारा घोटाले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की भूमिका पर सख्त टिप्पणी की थी. आईआरसीटीसी घोटाले में सीबीआई के डायरेक्टर ऑफ प्रोज्यूकेशन ने इस मामले में 9 आरोपितों की बजाय 8 के खिलाफ मामला चलाने की इजाजत दी जिसे सीबीआई निदेशक ने तत्काल मंजूरी दे दी. याचिका में कहा गया है कि सीबीआई ने आईआरसीटीसी के तत्कालीन डायरेक्टर राकेश सक्सेना के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की, लेकिन बाद में चार्जशीट में राकेश का नाम शामिल किया गया. इसके कारण जांच कमजोर हो गया क्योंकि एफआईआर में नाम नहीं होने के कारण राकेश सक्सेना हर जांच और पूछताछ से बचते रहे. इस मामले के प्रमुख आरोपी पूर्व रेल मंत्री के आवास पर छापा मारने गयी टीम को एक घंटे तक इसकी इजाजत नहीं दी गयी. इस मामले में सीबीआई निदेशक की भूमिका को लेकर जांच एजेंसी के अंदर ही कई तरह के सवाल उठे.
याचिका में कहा गया है कि मामले में जांच को कमजोर करने के लिए सीबीआई ने बिना इजाजत के कई लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया. याचिका में कहा गया है कि प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को पूर्व रेल मंत्री के बेनामी संपत्ति के मामले की विस्तृत जानकारी है.
क्या है मामला
आईआरसीटीसी के 2 होटलों की नीलामी में बड़े पैमाने पर हुए घोटाले को लेकर सीबीआई ने 7 जुलाई को लालू समेत 5 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी और कई ठिकानों पर छापेमारी की गयी थी. इस मामले में दर्ज सीबीआई की एफआईआर में कहा गया कि लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहते आईआरसीटीसी के पुरी और रांची स्थित बीएनआर होटल को निजी कंपनियों को देने का फैसला लिया गया और नियमों की अनदेखी करते हुए इसे कोचर बंधुओं की कंपनी सुजाता होटल को दिया गया. इसके बदले कोचर बंधुओं ने पटना में कीमती 3 एकड़ जमीन लालू परिवार के करीबी प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी डिलाइट मार्केटिंग कंपनी को बाजार कीमत से कम पर सौंप दिया. बाद में यह जमीन लालू परिवार की कंपनी लारा प्रोजेक्ट को सिर्फ 65 लाख में ट्रांसफर कर दिया गया, जबकि इसकी बाजार कीमत 32 करोड़ रुपये थी.
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