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कर्नाटक का चुनावी महासमर: उत्तर भारत की तर्ज पर लड़ा जा रहा चुनाव

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कर्नाटक का चुनावी महासमर: उत्तर भारत की तर्ज पर लड़ा जा रहा चुनाव

बेंगलुरु से अजय कुमार

दक्षिणी राज्य कर्नाटक में उत्तर भारत के राज्यों की तरह ही विधानसभा के चुनाव लड़े जा रहे हैं. जाति, पैसा और बाहुबल का बोलबाला खुलकर बोल रहा है. चुनाव की प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव की ओर है. 12 मई को यहां की सभी 224 सीटों पर वोट डाले जायेंगे. लेकिन, बेंगलुरु में आकर आप गच्चा खा सकते हैं, क्योंकि यहां चुनाव का कोई शोर नहीं है. न राजनीतिक तहरीर (लिखावट) न तकरीर (बहस).

लेकिन शहर से बाहर समुदाय व जाति का हिसाब हर जगह खड़ा है. लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने के सिद्दारमैया सरकार के फैसले के बाद सामाजिक समीकरण की खदबदाहट हर पार्टी में देखी जा सकती है. राज्य की कुल आबादी में लिंगायत पंथ को मानने वालों की हिस्सेदारी करीब 18 फीसदी है. यह समुदाय तीन दशकों से भाजपा के साथ रहा है.

900 साल बाद : 12वीं शताब्दी में हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र में हुए समाज सुधारक व संत बसवन्ना ने लिंगायत पंथ की स्थापना की थी. आप कह सकते हैं कि 900 साल के बाद यह पंथ राजनीतिक वजहों से सुर्खियों में है. कैसी विडंबना है कि नौ शताब्दी पहले जाति-धर्म की रूढ़ियों के विरोध में जिस लिंगायत पंथ की स्थापना हुई थी, उसके भीतर शामिल पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संख्या को किसी दल के लिए फायदा तो किसी के लिए नुकसान बताया जा रहा है. जानकारों का कहना है कि लिंगायत में करीब छह फीसदी आबादी इन्हीं जातियों की है.

मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को लिंगायत समुदाय के भीतर इन्हीं जातियों के वोट अपने पाले में करने का भरोसा है. ऐसे में समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया का जाति से जमात की थ्योरी यहां दरकती हुई दिखती है. कर्नाटक के चुनाव में तीन पार्टियों के तीन चेहरे हैं. मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर कांग्रेस का सारा दारोमदार टिका हुआ है. वह करुबा जाति से हैं, जो पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं. भाजपा के बीएस येदियुरप्पा हैं, जिन्हें कर्नाटक में जमीन से जुड़ा नेता माना जाता है. वह खुद लिंगायत पंथ से ताल्लुक रखते हैं. इस चुनाव का तीसरा कोण एचडी कुमार स्वामी हैं. वह वोक्कालिगा जाति से हैं. अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियों और दलितों के समुच्य को कन्नड़ में अहिंदा कहते हैं. अहिंदा को सिद्दारमैया पर प्रभाव माना जाता है.

ऐसे बदली है चुनावी तसवीर

2013 के विधानसभा चुनाव से इस बार की तसवीर बदली हुई है. तब येदियुरप्पा ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा था. उनकी पार्टी को उस वक्त 9.6 फीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस को 36 फीसदी और भाजपा को 26 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इस बार येदियुरप्पा भाजपा के साथ हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत में बड़ा फासला नहीं हुआ, तो जनता दल (एस) किंगमेकर की भूमिका में आयेगा. बहरहाल, जातीय समीकरणों से अलग इस चुनाव में पैसे का बोलबाला कम नहीं है. चुनाव आयोग के मुताबिक आयकर ने एक मई तक करीब 62 करोड़ रुपये पकड़े गये हैं. ये पैसे चुनाव में इस्तेमाल किये जाने थे. इसकी जांच चल रही है.

भाजपा की काट
भाजपा ने मुख्यमंत्री के बतौर येदियुरप्पा का नाम घोषित किया है. लेकिन सामाजिक समीकरण को साधने की गरज से सिद्दारमैया की जाति (करुबा) से आने वाले ईश्वरप्पा को उपमुख्यमंत्री घोषित कर दिया है. प्रेक्षकों का कहना है कि लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देकर जो चाल सिद्दारमैया ने चली, उसकी काट के लिए भाजपा ने ईश्वरप्पा का नाम उपमुख्यमंत्री के रूप में उछाल दिया. करुबा जाति की आबादी आठ फीसदी है.

चुनाव से गायब हैं मुद्दे
कर्नाटक में चुनावी सफर अंतिम पड़ाव की ओर है. लेकिन चुनाव से मुद्दे गायब हैं. रोजगार, शहरों के प्रबंधन, किसानों की खुदकुशी जैसे मामले सतह पर नहीं हैं. बीते पांच साल में 3500 किसान खुदकुशी कर चुके हैं. कठुआ और उन्नाव जैसे वाकयों के चलते भाजपा लॉ एंड आर्डर पर कांग्रेस की हुकूमत को घेर नहीं पा रही है. रोजगार के मोरचे पर भी कांग्रेस को भाजपा शिविर से तीर नहीं चुभ रहे हैं. स्थानीय पत्रकार इमरान कहते हैं- यह मुद्दाविहीन चुनाव है.

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