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फॉरेंसिक रिपोर्ट से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता : पी. सोलोमन

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फॉरेंसिक रिपोर्ट से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता : पी. सोलोमन

महागामा थाना क्षेत्र के कसबा गांव स्थित उम्मूल मोमिन जामिया आयशा लिल बनात मदरसा में छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले की जांच के लिए झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग की चार सदस्यीय टीम ने सोमवार को मदरसा का निरीक्षण किया. टीम में आयोग के उपाध्यक्ष पी. सोलोमन, सदस्य हाजी इकरारूल हसन आलम, कारी बरकत अली एवं सबिता टुडू शामिल थीं. प्रेस वार्ता के दौरान आयोग के उपाध्यक्ष पी. सोलोमन ने कहा हमने मदरसे का निरीक्षण कर छात्रों, शिक्षकों व अन्य संबंधित लोगों से जानकारी ली है. पुलिस की जांच जारी है और पोस्टमार्टम व फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद ही कोई ठोस निष्कर्ष निकाला जा सकता है. सरकार की ओर से पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की पूरी कोशिश की जा रही है. वहीं निरीक्षण के दौरान टीम ने मदरसे के सभी कमरों और घटनास्थल का जायजा लिया. छात्रा के कथित रूप से फांसी लगाने की जगह को भी बारीकी से देखा गया. जब टीम ने हेड मौलवी के बारे में जानकारी ली, तो बताया गया कि वह फिलहाल बाहर हैं. टीम को मदरसे के ऊपरी मंजिल के उस कमरे में भी ले जाया गया, जहां छात्रा द्वारा फंदा लगाने की बात कही गयी थी.

राजमहल हाउस में की पदाधिकारियों संग बैठक, ली जानकारी

कसबा पहुंचने से पहले आयोग के सदस्यों ने महागामा एसडीओ आलोक वरण केसरी, एसडीपीओ चंद्रशेखर आजाद, थाना प्रभारी शिवलाल सिंह, इंस्पेक्टर उपेंद्र कुमार, डीईओ मिथिला टुडू के साथ बैठक कर मामले की विस्तृत जानकारी ली. भव्य इमारत में मौजूद 20 कमरे और एक बड़ा हॉल साफ-सफाई से युक्त मिले, लेकिन चार दिनों से मदरसा बंद है और किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश की अनुमति नहीं है. हेड मौलवी सहित सभी नामजद आरोपी फरार बताये जा रहे हैं. मदरसा केवल बालिकाओं के लिए संचालित है.

घटनास्थल पर उठते हैं कई सवाल

जिस दीवार से फंदा लगाने की बात कही गयी, वह जमीन से करीब 10 फीट ऊंची है. इतनी ऊंचाई पर छोटी बच्ची बिना किसी सहारे के कैसे पहुंची. वहां कुर्सी या मेज जैसी कोई वस्तु नहीं पायी गयी, फिर वह फंदे पर झूल कैसे गयी. मदरसे में मौजूद 700 छात्राओं में से किसी को भी रात में हुई इस घटना की भनक तक नहीं लगी, यह कैसे संभव है. टीम के सदस्यों ने मदरसे के विभिन्न कमरों में जाकर शिक्षकों से भी बातचीत की. जांच के दौरान मदरसे के बाहर भी सुरक्षा व्यवस्था सख्त रही और अधिकारी आने पर ही दरवाजे खोले जा रहे थे.

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