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Buxar News: प्रभु श्रीराम के वन गमन से अयोध्या में छाया मातम

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Buxar News: प्रभु श्रीराम के वन गमन से अयोध्या में छाया मातम
सांकेतिक तस्वीर

बक्सर

. ऐतिहासिक किला मैदान में रामलीला समिति के तत्वावधान में चल रहे 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के 11 वें दिन बुधवार की रात रामलीला में “राम वन गमन व केवट ” प्रसंग का मंचन किया गया. जिसमें दिखाया गया कि श्रीराम का चौदह वर्ष के लिए वनवास जाते ही अयोध्या में मातम पसर जाता है. जबकि दिन में मंचित श्रीकृष्ण लीला के सुदामा चरित्र-1 में श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता परवान चढ़ा. वृंदावन से पधारे श्री राधा माधव रासलीला एवं रामलीला मंडल के स्वामी श्री सुरेश उपाध्याय “व्यास जी ” के निर्देशन में दोनों प्रसंग जीवंत किए गए.

शहर भ्रमण करते वन को प्रस्थान किए प्रभु श्रीराम “राम वन गमन व केवट प्रसंग लीला ” में दिखाया गया कि मंत्री सुमंत जी रथ पर श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी को बैठाकर वन छोड़ने जाते हैं. मंचन के दौरान दिखाया गया कि सायं 5:00 बजे भगवान का रथ रामलीला मैदान से प्रस्थान कर नगर भ्रमण करते हुए स्टेशन रोड स्थित कमलदह सरोवर पहुंचता है. फिर वहां से लौटकर रथ रामलीला मंच पहुंचता है. श्रीराम, लक्ष्मण और सीता मंत्री सुमंत के साथ वन में पहुंचते हैं. वहां उनकी भेंट निषाद राज से भेंट होती है. निषादराज प्रभु श्रीराम के सेवा- सुश्रुषा में व्यस्त हो जाते हैं. प्रभु श्री राम निषादराज से बरगद का दूध मंगाकर उसी से अपने अपने बालों की जटा बनाते हैं. यह देखकर मंत्री सुमंत का कलेजा फट जाता है और वह प्रभु से वन नहीं जाने के लिए पुन: विनती करते हैं. श्री राम जी मंत्री को दुखित देख धीरज बंधाते हैं और श्री सीता जी को वन जाने से मना करते हैं. परंतु सीता लौटने से इंकार कर देती है, तब प्रभु श्री राम सुमंत को वहां से वापस कर देते हैं. इधर श्रीराम जी केवट से नदी पार करने के लिए नाव मांगते हैं. केवट कहता है भगवान मै आपकी महिमा को जानता हूं. आपके चरण रज का स्पर्श होते ही जब पत्थर नारी बन गई तो यह नाव तो लकड़ी की है. सो बिना आपका पैर धोए मैं नाव को आगे नहीं ले आऊंगा. परस्पर संवाद के बाद श्रीराम की स्वीकृति पर केवट उनका चरण पखारता है, फिर नदी पार कराता है.

शिक्षा ग्रहण को सांदिपनि आश्रम पहुंचे श्रीकृष्ण व सुदामाश्रीकृष्ण लीला के “सुदामा चरित्र भाग -1 में दिखाया गया कि महाराज वासुदेव जी विद्या ग्रहण करने के लिए श्री कृष्ण को गुरु सांदीपन जी की पाठशाला में भेजते हैं. मार्ग में उसी पाठशाला में जाते समय सुदामा से मुलाकात होती है. सुदामा के पैर में एक कंटक चुभ जाता है और उनके मुख से प्रभु के नाम की चीख निकलती है. जिसे सुनकर कृष्ण सुदामा के समीप आकर कंटक को पैर से निकालते हैं और वहीं से दोनों में मित्रता हो जाती है. इस क्रम में आगे दिखाया गया कि सुदामा जी अपना पाठ भूल जाते हैं, जिससे गुरुदेव सांदीपनि जी दण्ड स्वरूप उनको वनों में जाकर लकड़ी लाने को कहते है यह देखकर मित्रता निभाने के लिए श्री कृष्ण भी जानबूझ कर अपना पाठ भूल जाते हैं. गुरुदेव दोनों को वन से लकड़ी लाने को भेजते हैं और साथ में भूख लगने पर खाने के लिए चना की पोटली भी देते हैं. आगे दिखाया जाता है कि वन में सुदामा को भूख लगती है तो वह कृष्ण के हिस्से का भी चना खा जाते हैं, जिसकी जानकारी होने पर गुरुदेव सुदामा को दरिद्रता का शाप दे देते हैं.

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