-हरिवंश-
राज्य में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य भी किये. स्थानांतरण उद्योग पर पाबंदी की घोषणा की. सचिवालय में समय से संचिका निष्पादन का समयबद्ध कार्यक्रम तय किया. बिगड़े अफसरों में अनुशासन का डर पैदा किया. औचक निरीक्षण के कारण अफसर अपनी कुरसी पर बैठने लगे. इन कार्यों से बिहार के सचिवालय (जो उद्योग-सौदेबाजी का अड्डा बन गया था) से राजनीतिक दलालों की अनावश्यक भीड़ छंटने लगी.
भागवत झा आजाद का आरंभिक दौर आशा और उत्साह से भरा था. उस दौर में भागवत झा के तीखे स्वर और बेलगाम बातें भी लोगों नहीं चुभती थीं. उन्होंने इंजीनियरों-ठेकेदारों को सही काम न करने पर पैर तोड़ने की धमकी दी. बिहार के इन लुटेरे तत्वों के खिलाफ मर्यादा के बाहर आकर उन्होंने गाली-गलौज की. शिक्षा को उद्योग बनानेवाले अपराधी अध्यापकों को रास्ते पर लाने के लिए भी उन्होंने फूहड़ तरीके से बातें कीं. चूंकि बिहार की जनता इन तत्वों से आजिज आ गयी है. इस कारण इंजीनियरों-ठेकेदारों-अफसरों और अनुशासनहीन अध्यापकों पर भागवत झा को अमर्यादित रूप से बरसते देख कर वह प्रसन्न थी.
पटना में अवैध रूप से जमीन हथियाये अनेक ताकतवर लोगों को आजाद की सरकार ने बेदखल किया. पहली बार अंगरेजपरस्त सर सीपीएन सिंह द्वारा हथियायी भूमि को सरकार ने पुन: हस्तगत किया. अवैध निर्माण गिराये गये. धनबाद माफिया तत्वों के खिलाफ प्रशासन को चुस्त किया. सहकारिता माफिया पर गाज गिरी. भागवत झा आजाद के ऐसे कार्यों से यह आभास मिलता रहा कि वह रुग्ण राज-समाज को ठीक करना चाहते हैं. इस क्रम में उनकी फूहड़ बातचीत और सामंती कार्यशैली के अनेक किस्से सार्वजनिक हुए. लेकिन लोगों ने उन्हें आरंभ में नजरअंदाज किया. मध्य बिहार की समस्याओं को सलटाने के प्रति भी उन्होंने तत्परता दिखायी.
डॉ. विनयन से गोपनीय मुलाकात की. मध्य बिहार के सामंतों को सामंती अंदाज में ही अपने भाषण में डराया-धमकाया. राजनीतिक दलालों को अपने आवास से निकाल-बाहर किया. लेकिन महज गाली-गलौज या उग्र तेवर से प्रशासन नहीं चलता, इस तथ्य को भागवत झा भूल गये. बड़ी-बड़ी बातें करने में ही वह मशगूल रहे, उनके आदेशों का कार्यान्वयन हो रहा है या नहीं, यह जानने की उन्हें फुरसत नहीं मिली. कुछ ही महीनों में उनकी अनेक घोषणाएं ढपोरशंखी साबित हुई. कार्य के स्तर पर वह सिफर साबित होने लगे. प्रशासन और अनुशासन ठीक करने की बातें हवाई घोषणा सिद्ध होने लगी. खुद को ‘ईमानदार’ और अपनी पार्टी के दूसरे लोगों को ‘बेईमान’ मानने की उनकी प्रवृत्ति ने उन्हें दल में भी अलग-थलग कर दिया. जनता के बीच अपनी शाही घोषणाओं-फरमानों से जो उम्मीदें वह जगा चुके थे, वे तुरंत खत्म हो गयीं.
इस कारण प्रशासन के प्रति अनास्था फैली. इसका ज्वलंत उदाहरण था नोन्हीं-नगवां हत्याकांड के बाद वहां दिया गया उनका उत्तेजक भाषण. उन्होंने अपराधियों को सख्त सजा देने की घोषणा की. गांव पर सामूहिक जुरमाने की बात की. आसपास के सामंतों के हथियार जब्त करने का फरमान जारी किया. लेकिन पटना लौटते ही उन्होंने कुख्यात जहानाबाद लॉबी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उधर जहानाबाद के पीड़ित लोगों में उम्मीद थी कि हत्यारे तुरंत पकड़े जायेंगे. लेकिन कुछ ही दिनों बाद दमुहां-खगरी में सामंतों और अपराधियों की फौज ने हरिजनों का फिर कत्ल किया. मुख्यमंत्री वहां गये, तो उनके मुंह में कालिख पोत दी गयी.
वस्तुत: यह कालिख शासन में लोगों की अनास्था और मुख्यमंत्री की ढपोरशंखी घोषणाओं के विरोध में पोती गयी. यह कार्य, जनतांत्रिक शासन में जन आक्रोश का गंभीर प्रतीक है. कालिख लगने की घटना से कांग्रेस आलाकमान भी बहुत खफा हुआ. सामंतों को खुलेआम फटकारने और नोन्हीं-नगवां हत्याकांड के हत्यारों को दंड दिलाने के उनके संकल्प के कारण जो माहौल बना था, वह उनकी प्रशासनिक विफलता ने खत्म कर दिया. इसकी जगह मुख्यमंत्री के प्रति नफरत और कांग्रेस के प्रति लोगों के मन में दूरी बढ़ी. आजाद की पुलिस हरिजनों और विनयन के समर्थकों को ही तंग करने लगी.
इससे कांग्रेस के प्रति मध्य बिहार में नफरत बढ़ी. इस चुनौती को स्वीकार करने का काम सीताराम केसरी ने किया. दमुहां-खगरी हत्याकांड के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कबूल किया कि हरिजन और पिछड़े कांग्रेस से बिदक रहे हैं. सीताराम केसरी ने वहां बगैर पुलिस संरक्षण के पदयात्रा की. बिहार के दूसरे अशांत इलाकों में भी वह बगैर पुलिस-प्रशासन सहयोग के पदयात्रा करना चाहते हैं. भागवत झा आजाद ने अपनी कार्यशैली और बेतुकी घोषणाओं से जनता को तो नाराज किया ही, साथ ही अपने दल के वरिष्ठ सदस्यों से भी वह उलझ गये. आज बिहार के जो भी वरिष्ठ नेता दिल्ली-पटना में हैं, वे भागवत झा आजाद से खफा हैं और उनके खिलाफ सक्रिय हैं.
आजाद के मुख्यमंत्री बनते ही जगन्नाथ मिश्र और तारिक अनवर ने उन्हें भरपूर समर्थन देने की घोषणा की थी. बिंदेश्वरी दुबे भी उन्हें सहयोग दे रहे थे, लेकिन कमान संभालते ही उन्होंने दुबे जी की पूर्व सरकार पर आक्रमण शुरू किया. इस कारण खामोश बैठे दुबे जी भी आहत महसूस करने लगे. तारिक अनवर जैसे निर्विवाद नेता ने भी बीस सूत्री कार्यक्रम समिति के कार्यकारी अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया. साथ ही सरकार की कार्यशैली से नाराजगी प्रगट की. नागेंद्र झा के इशारे पर आजाद ने जगन्नाथ मिश्र के इलाके में दौरा शुरू किया. इससे जगन्नाथ मिश्र खफा हुए. सीताराम केसरी को आजाद ने पहले ही नाराज कर दिया था. इस तरह कांग्रेस के चोटी के बिहारी नेताओं के खिलाफ श्री आजाद ने नया अनावश्यक फ्रंट खोल लिया. बिहार के सांसदों को पत्र लिखा कि कार्य के लिए वे मुझसे न मिलें, संबंधित मंत्री से बातचीत करें. परिणामस्वरूप कांग्रेसी सांसद भी मुख्यमंत्री से दूर छिटकते गये. एक आकलन के अनुसार महज सात कांग्रेसी सांसद ही भागवत झा आजाद के साथ हैं. विधायकों पर भी मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से हमला आरंभ किया.
कांग्रेसी असंतुष्ट ऐसे ही अवसर की तलाश में थे. मुख्यमंत्री ने जब अपने व्यवहार से सबको नाराज कर दिया, तो असंतुष्टों ने आजाद सरकार के खिलाफ 16 मुद्दों का शिकायती पत्र तैयार किया और उसे शीला दीक्षित को सौंप दिया. अगस्त में बिहार के 55-56 असंतुष्ट विधायक दिल्ली पहुंचे. एलएन झा ने प्रधानमंत्री से 29 जुलाई को मिलने का समय मांगा. उधर से सूचना मिली की 2 अगस्त को असंतुष्ट विधायकों से प्रधानमंत्री मिलेंगे. आरंभ में मिलनेवालों की सूची में 36 विधायकों के नाम प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गये. बाद में यह संख्या बढ़ कर 55 हो गयी. इनमें 50 विधायक बिंदेश्वरी दुबे के समर्थक और पांच डॉ जगन्नाथ मिश्र के खेमे के थे.
