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आप्रवासी घाट पर राष्ट्रपति

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आप्रवासी घाट पर राष्ट्रपति
-हरिवंश (राष्ट्रपति के साथ मॉरिशस यात्रा में)-

भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया. मॉरिशस की राष्ट्रीय सभा (नेशनल असेंबली) को संबोधित किया. फिर आप्रवासी घाट गयीं. शाम में इंदिरा गांधी सेंटर फॉर इंडिया कल्चर द्वारा आयोजित कार्यक्रमों मेंभाग लिया.

मॉरिशस की राष्ट्रीय सभा में उन्होंने भारत की विविधता पर भी चर्चा की. कहा, दुनिया के हर छह लोगों में से एक भारत में बसता-रहता है. 22 भाषाएं और 1700 बोलियां. हर धर्म के अनुयायी वहां हैं. इसी तरह मॉरिशस की विविधता की चर्चा उन्होंने की. मॉरिशस के प्रधानमंत्री डॉ नवीन चंद्र रामगुलाम ने धन्यवाद प्रस्ताव में अत्यंत सम्मान और आत्मीयता से भारत की बात की.
पर राष्ट्रपति की आप्रवासी घाट यात्रा यादगार आयोजन है. यह वही घाट है, जहां भारत से आनेवाले मजदूर उतरते थे. दो दिन रोके जाते थे. अगर समुद्री यात्रा में बच गये, तो वहां दो दिनों जांच चलती थी.
नारकीय जीवन. भारतीय कुली या गिरमिटिया मजदूर कुली दासता का पहला कदम यहीं रखते थे. यहां से सब संग-साथ छूट जाता था. संयोग से पति-पत्नी रहे, तो उन्हें भी अलग-अलग गोरे मालिक ले जाते थे. इस घाट की यात्रा भारतीयों (खासतौर से हिंदी भाषी लोगों) की पीड़ा, दुख और संघर्ष के इतिहास की स्मृति से रू-ब-रू होना है.
राष्ट्रपति का इस स्थल पर आना, उन भारतीयों के प्रति सम्मान है, जिनके तप, त्याग और कुरबानी ने भारत का सिर ऊंचा किया है. वहां एक 18-19 वर्ष की गाइड युवती सुनयना हमें हिंदी-अंगरेजी में एक-एक चीज का इतिहास बता रही थी. पुरखों और पूर्वजों की पीड़ा का अध्याय.उससे पूछा, तुम्हारी जड़ें कहां हैं? कहा, भारतवासी हूं.
हिंदी भाषी. जड़ मालूम नहीं, पर अंत में अंगरेजी में कहा ‘वी आर प्राउड टू वी इंडियन’ (भारतीय होने पर हमें गर्व-अभिमान है). इसी घाट पर बेबस भारतीयों की भीड़ पोर्ट लुई पर उतारी जाती थी. जानवरों की तरह काम में जोत दी जाती थी. घाट पर स्थित पत्थर के हौदों, सीढ़ियों और कोठरियों में लाखों लोगों के जीवन की विवशताएं हैं, तो जीवन से संघर्ष के अदभुत दास्तान भी. मनुष्य की गरिमा-ऊंचाई तय करने के नये अध्याय भी इन्हीं बेजुबान पत्थरों को गवाह बना कर लिखे गये. इस अद्भुत दास्तां पर अलग से, फिर कभी चर्चा.
आज इस घाट पर राष्ट्रपति की उपस्थिति से वह पुरानी स्मृति मॉरिशस में भी उभरी. पिछले साल दो नवंबर से पूरे मॉरिशस में गिरमिटिया यात्रा प्रदर्शनी घूम रही है. उस स्मृति को नयी पीढ़ी से दरस-परस कराते.
उस आप्रवासी ट्रस्ट को भारत की राष्ट्रपति ने तीन चीजें सौंपी. (1) 150 गिरमिटिया मजदूरों के टिकटों का डिजिटल प्रिंट (2) डाकेट्स (3) महात्मा गांधी के डाक टिकट. इस कार्यक्रम के मकसद थे- (1) यात्रा, गिरमिटियों की उस पुरानी दास्तां की स्मृति सिलसिला चले. (2) संघर्ष का पुनर्स्मरण, (3) भविष्य के लिए इसके स्मरण से ताकत मिले (4) प्रगति में भारत और मॉरिशस की साझेदारी भविष्य में और मजबूत-प्रगाढ़ हो. अतीत स्मरण की बुनियाद पर.
शाम का कार्यक्रम इंदिरा गांधी सेंटर फॉर इंडिया कल्चर में हुआ. भारत के बाहर, भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक केंद्र इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चर रिलेशंस द्वारा संचालित. मॉरिशस के प्रधानमंत्री ने याद किया कि वर्ष 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी नींव रखी थी. फिर उन्होंने इंदिरा गांधी को बड़े आदर, सम्मान और ऊंचाई से याद किया. कहा, श्रीमती गांधी मॉरिशस को चौथा भारत कहती थीं. 1970 की उनकी पहली यात्रा, फिर 1976 में श्रीमती गांधी के मॉरिशस आने की याद दिलायी. यह संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ आयी थीं. मॉरिशस के प्रधानमंत्री ने अपने परिवार (सर शिवसागर रामगुलाम) और नेहरू परिवार के आत्मीय संबंधों की भी चर्चा की. भारत की राष्ट्रपति ने भी श्रीमती गांधी की खूबियों को स्मरण कराया.
इस केंद्र के कार्यक्रम की शुरुआत यहीं के युवा कलाकारों ने अपने कार्यक्रमों से की. तुलसीदास लिखित वंदना ‘गाइए गणपति जगवंदन’ से. फिर तबला तरंग में तबला और ढोल पर कार्यक्रम. फिर संत रामदास की रचना ‘बादल गरज नवघोर, शोर पपिहरा बहुत करत है’ पर मन मोहनेवाला कत्थक नृत्य.
ये सांस्कृतिक कार्यक्रम मनमोहक थे. एक मित्र ने कहा ‘भारत से ज्यादा भारतीय.’
सचमुच भारत पश्चिम की ओर है. बल्कि पश्चिम नहीं, अमेरिकी धुन में डूब रहा है. भारतीयता को भूलते हुए, पर वह भारतीय गंध, भारत से छह हजार किमी दूर मॉरिशस में मुग्ध कर रही है.
दिनांक 27.04.2011
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