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World Radio Day 2020: …जब बिनाका गीत माला के लिए लग जाती थी भीड़

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World Radio Day 2020: …जब बिनाका गीत माला के लिए लग जाती थी भीड़

World Radio Day 2020: 1906 के दशक में रेडियो की शुरुआत हुई. भारत में रेडियो 1923 के दशक में पहुंचा. श्रोताओं ने इसे हाथों हाथ लिया. 1923 के दौर का इम्पीरियल रेडियो ऑफ इंडिया ही आजादी के बाद ऑल इंडिया रेडियो में बदल गया. भले ही इंटरनेट व स्मार्टफोन्स का जमाना हो लेकिन रेडियो के प्रति लोगों की दीवानगी आज भी कम नहीं हुई है. वाहन चालक, विद्यार्थी, व्यवसायी समेत करोड़ों लोग आज भी रेडियो सुनते हैं. जब इंटरनेट व स्मार्टफोन बाजार में आया तो लोगों ने कहा कि अब रेडियो समाप्त हो जायेगा. लेकिन इसका और विस्तार हुआ. रेडियो पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम से पीएम नरेंद्र मोदी ने रेडियो को घर-घर तक पहुंचाया. कुल मिलाकर डिजिटल संचार की दुनिया में रेडियो आज भी किसी अन्य मीडिया की तुलना में अधिक लोगों तक पहुंचता है. यह एक ऐसा मंच है जहां लोग अपने विचारों, चिंताओं और शिकायतों को प्रकट कर सकते हैं. मनोरंजन भी कर सकते हैं. 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस पर लाइफ@जमशेदपुर के लिए कन्हैया लाल सिंह की विशेष प्रस्तुति.

रेडियो धूम से हुआ इंटरव्यू प्रसारित
गोलमुरी के रिंकु कुमार लियो क्लब वेस्ट (लायंस क्लब का यूथ पार्ट) और एनएसएस से जुड़े हैं. बताते हैं कि रेडियो पर एनजीओ, सोशल वर्क से संबंधित जानकारी मिलती रहती है. शहर में क्या-क्या होने वाला है आदि की जानकारी मिलती है. वे बताते हैं कि वर्ष 2017 में राष्ट्रपति से उन्हें अवार्ड मिला था. इस कारण रेडियो धूम से उनका इंटरव्यू प्रसारित हुआ था. जिसे उन्होंने घर पर अपने परिजनों के साथ सुना था.

बिनाका गीत माला के लिए लग जाती थी भीड़
डिमना के गुलाब सिंह पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि बीते जमाने में मनोरंजन का एक मात्र साधन रेडियो था. जमशेदपुर के हर इलाके के मैदान में लाउड स्पीकर लगा रहता था. इसमें यूनाइटेड क्लब से गीत प्रसारित होते थे. वर्ष 1961 में चीन युद्ध के बाद उन्होंने बीबीसी सुनना शुरू किया. वे बताते हैं कि बिनाका गीत माला में गीतो के ऊपर-नीचे होने की दिलचस्पी तो रहती ही थी, अमीन सयानी की आवाज के भी लोग दीवाने थे. इसे सुनने के लिए पान दुकान में भीड़ लग जाती थी. विविध भारती के पंचरंगी कार्यक्रम का अपना जलवा था. इसमें हर दिन कोई-न-कोई पिटारा खुलता था.

कम हुई रेडियो सेट की बिक्री, श्रोता बढ़े
रेडियो श्रोता संघ जमशेदपुर के अध्यक्ष भारत भूषण दोस्त मानते हैं कि रेडियो फिर से वापस आ गया है. उनका मानना है कि रेडियो की पहचान कभी कम नहीं होने वाली. रेडियो सेट की बिक्री कम या कहें बंद हो गयी है लेकिन इसका सुनना बंद नहीं हुआ. श्रोता अभी एफएम पर इसका लुत्फ उठा रहे हैं. वे रेडियो सीलोन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि यहां से बिनाका गीता माला प्रसारित होता था. जिसे लोग बहुत चाव से सुनते थे. हफ्ते भर में कौन से गीत किस पायदान पर यह जानने की उत्सुक सप्ताह भर रहती थी.

रेडियो धूम व आकाशवाणी है मेरा पसंदीदा चैनल
समय के साथ-साथ रेडियो और इसके श्रोता भी बदलने चले गये. रेडियो सेट तो नहीं रहा लेकिन फोन व अन्य माध्यम से श्रोताओं आज में नये-पुराने गीत आज भी उसी चाव से सुनते हैं, जैसा पहले सुना जाता था. न्यू केबल टाउन के देवाशीष टीएसडीपीएल में कार्यरत हैं. उन्हें फिल्मी गीत सुनने का शौक है. खाली समय में वे एफएम रेडियो सुनते हैं. वे बताते हैं कि उन्हें पुराने गीत, मिमिक्री जैसे कार्यक्रम अच्छे लगते हैं. आठ घंटे काम करने के बाद गीत ही थकान को दूर करता है. वे रेडियो धूम और आकाशवाणी के प्राय: कार्यक्रम चाव से सुनते हैं.

आपकी फरमाइश व सखी सहेली के दीवाने
गोलपहाड़ी के कुमार अजय बैंक में कार्यरत हैं. वे बताते हैं कि पांच-छह साल पहले वे फरमाइश कार्यक्रम जरूर सुनते थे लेकिन जाॅब की वजह से समय नहीं मिल पाता. फिर भी दफ्तर में ही लंच टाइम में गाने बजते हैं. वे बताते हैं कि धूम कैफे में भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, नागपुरी जैसे स्थानीय भाषाओं के गीत प्रसारित होते हैं. जिसे वह चाव से सुनते हैं. उन्हें विविध भारती पर सखी सहेली कार्यक्रम भी अच्छा लगता है. उनका मानना है कि आज भी मास का पहुंचने का जरिया रेडियो ही है.

पार्किंग मुद्दा से जुड़े श्रोता
केबुल टाउन के शुभाशीष प्राय: शाम में रेडियो सुनते हैं. वे बताते हैं कि हाल ही में रेडियो धूम द्वारा पार्किंग का मुद्दा जोरशोर से उठाया गया था. जिससे श्रोता जुड़े. वे सफर के दौरान कार में गीत सुनते हैं. वे बताते हैं कि रेडियो सुनकर संबंधी गीत आदि के दृश्य आपके सामने नाचने लगते हैं. टीवी में तो आंखों के सामने दृश्य आ जाता है. इसलिए रेडियो की महत्ता है. वे बताते हैं कि घर में रेडियो था लेकिन दादा दादी गुजरे गये तो रेडियो भी बंद हो गया.

बिनाका गीत माला के लिए लग जाती थी भीड़
डिमना के गुलाब सिंह पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि बीते जमाने में मनोरंजन का एक मात्र साधन रेडियो था. जमशेदपुर के हर इलाके के मैदान में लाउड स्पीकर लगा रहता था. इसमें यूनाइटेड क्लब से गीत प्रसारित होते थे. वर्ष 1961 में चीन युद्ध के बाद उन्होंने बीबीसी सुनना शुरू किया. वे बताते हैं कि बिनाका गीत माला में गीतो के ऊपर-नीचे होने की दिलचस्पी तो रहती ही थी, अमीन सयानी की आवाज के भी लोग दीवाने थे. इसे सुनने के लिए पान दुकान में भीड़ लग जाती थी. विविध भारती के पंचरंगी कार्यक्रम का अपना जलवा था. इसमें हर दिन कोई-न-कोई पिटारा खुलता था.

कम हुई रेडियो सेट की बिक्री, श्रोता बढ़े
रेडियो श्रोता संघ जमशेदपुर के अध्यक्ष भारत भूषण दोस्त मानते हैं कि रेडियो फिर से वापस आ गया है. उनका मानना है कि रेडियो की पहचान कभी कम नहीं होने वाली. रेडियो सेट की बिक्री कम या कहें बंद हो गयी है लेकिन इसका सुनना बंद नहीं हुआ. श्रोता अभी एफएम पर इसका लुत्फ उठा रहे हैं. वे रेडियो सीलोन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि यहां से बिनाका गीता माला प्रसारित होता था. जिसे लोग बहुत चाव से सुनते थे. हफ्ते भर में कौन से गीत किस पायदान पर यह जानने की उत्सुक सप्ताह भर रहती थी.

रेडियो धूम व आकाशवाणी है मेरा पसंदीदा चैनल
समय के साथ-साथ रेडियो और इसके श्रोता भी बदलने चले गये. रेडियो सेट तो नहीं रहा लेकिन फोन व अन्य माध्यम से श्रोताओं आज में नये-पुराने गीत आज भी उसी चाव से सुनते हैं, जैसा पहले सुना जाता था. न्यू केबल टाउन के देवाशीष टीएसडीपीएल में कार्यरत हैं. उन्हें फिल्मी गीत सुनने का शौक है. खाली समय में वे एफएम रेडियो सुनते हैं. वे बताते हैं कि उन्हें पुराने गीत, मिमिक्री जैसे कार्यक्रम अच्छे लगते हैं. आठ घंटे काम करने के बाद गीत ही थकान को दूर करता है. वे रेडियो धूम और आकाशवाणी के प्राय: कार्यक्रम चाव से सुनते हैं.

आपकी फरमाइश व सखी सहेली के दीवाने
गोलपहाड़ी के कुमार अजय बैंक में कार्यरत हैं. वे बताते हैं कि पांच-छह साल पहले वे फरमाइश कार्यक्रम जरूर सुनते थे लेकिन जाॅब की वजह से समय नहीं मिल पाता. फिर भी दफ्तर में ही लंच टाइम में गाने बजते हैं. वे बताते हैं कि धूम कैफे में भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, नागपुरी जैसे स्थानीय भाषाओं के गीत प्रसारित होते हैं. जिसे वह चाव से सुनते हैं. उन्हें विविध भारती पर सखी सहेली कार्यक्रम भी अच्छा लगता है. उनका मानना है कि आज भी मास का पहुंचने का जरिया रेडियो ही है.

पार्किंग मुद्दा से जुड़े श्रोता
केबुल टाउन के शुभाशीष प्राय: शाम में रेडियो सुनते हैं. वे बताते हैं कि हाल ही में रेडियो धूम द्वारा पार्किंग का मुद्दा जोरशोर से उठाया गया था. जिससे श्रोता जुड़े. वे सफर के दौरान कार में गीत सुनते हैं. वे बताते हैं कि रेडियो सुनकर संबंधी गीत आदि के दृश्य आपके सामने नाचने लगते हैं. टीवी में तो आंखों के सामने दृश्य आ जाता है. इसलिए रेडियो की महत्ता है. वे बताते हैं कि घर में रेडियो था लेकिन दादा दादी गुजरे गये तो रेडियो भी बंद हो गया.

बीबीसी से मिला था पुरस्कार
बिष्टुपुर निवासी रमन भी रेडियो श्रोता संघ के सदस्य हैं. वे बताते हैं कि सीलोन से कई बार कच्चा रेकॉर्ड भी बजता था. निर्माता अपनी फिल्म के प्रचार के लिए कच्चा रेकॉर्ड भेज देते थे. वे बताते हैं कि राज कपूर अभिनीत फिल्म दीवाना का कच्चा रेकॉर्ड सीलोन से बजा था. वहां के उद्घोषक मनोहर महाजन, रिपुदमन सिंह, जयलक्ष्मी डिसिल्वा की आवाज के लोग कायल थे. वे सीलोन के साप्ताहिक कार्यक्रम वाक्य गीतांजलि को याद करते हैं. उदाहरण के लिए नींद हमारे, ख्वाब तुम्हारे/ कितने मीठे, कितने प्यारे, इसमें हर शब्द से गीत ढूंढ़कर भेजना था.

मुंबई में रिकॉर्डिंग, सीलोन से ब्रॉडकास्ट : रमन बताते हैं कि बिनाका गीतमाला सीलोन से ब्रॉडकास्ट होता था. लेकिन अमीन सयानी इसकी रिकॉर्डिंग मुंबई में ही करते थे. बीबीसी लंदन से उन्हें उपहार में पुस्तक मिली थी. रमन बताते हैं कि बीबीसी से अक्सर जमशेदपुर के जंग बहादुर सिंह, जुगलसाई के भाटिया परिवार का नाम लिया जाता था. बाद में सभी से परिचय बना.

गीत के बीच मिलती है जानकारी: बागबेड़ा के शुभम तिवारी पेट्रोलियम एंड ऑयल गैस डिपार्टमेंट में हैं. इस कारण वे शाम में ही रेडियो सुन पाते हैं. इसके लिए शाम पांच से आठ बजे का समय फिक्स है. वे आकाशवाणी से प्रधानमंत्री के मन की बात भी जरूर सुनते हैं. जिसमें डिजिटल इंडिया, सरकार की नयी-नयी योजनाओं की जानकारी मिलती है. आरजे की बात सुनकर प्रेरणा मिलती है. उन्हें नब्बे के दशक के गीत सुनना पसंद है. गीत के बीच छोटे-छोटे कई आवश्यक सूचनाएं व जानकारी मिलती रहती है.

घर में बनाया मिनी रेडियो म्यूजियम: संघ के सदस्य कदमा निवासी चिन्मय महतो का रेडियो से इस कदर लगाव है कि उन्होंने घर पर ही मिनी रेडियो म्यूजियम बना लिया. जिसमें हर दशक के छोटे-बड़े पचासो रेडियो हैं. जिसके जरिये जमाने विशेष की तकनीक समझी जा सकती है. वे रेडियो सीलोन, रेडियो जापान, वाइस ऑफ अमेरिका, स्विडन आदि में फरमाइशी गीत व अन्य कार्यक्रम के लिए खत लिखते थे. रेडियो से उनका नाम अनांउस होता था. खत लिखने का चस्का इस कदर था कि रात में दो-दो बजे तक जगकर इसे पूरा करते थे और अगले दिन पोस्ट करते थे. जापान के क्विज कांटेस्ट कार्यक्रम के वे विजेता बने. वहां से कुछ-न-कुछ पुरस्कार आ जाता था. वे बताते हैं कि इस कार्यक्रम में बांग्लादेश और पाकिस्तान के श्रोता को सांत्वना पुरस्कार मिला था. अच्छी लिखावट के लिए महीने में एक श्रोता चुने जाते थे.

स्टील सिटी में रेडियो धूम की धूम: जमशेदपुर में वर्ष 2008 में रेडियो धूम शुरू हुआ. और देखते-देखते यह लोगों का पसंदीदा बन गया. यहां के आरजे प्रसून बताते हैं कि प्रसारित होने वाले किसी भी शो के पहले तैयारी करनी पड़ती है. कंटेंट क्या होगा यह देखना पड़ता है. और उसे रोचक भी बनाना पड़ता है. वे बताते हैं कि रेडियो में 60 प्रतिशत इंटरटेनमेंट और 40 फीसदी सूचना रहती है. जिसमें सिटी, ट्विटर, सोशल मीडिया, बॉलीवुड की गॉपिश रहती है. इसलिए आरजे को हर तरह की जानकारी रखनी पड़ती है. फेडर ऑन करने के छह सेकेंड के बाद बातें लोगों तो पहुंच जाती है. सॉफ्टवेयर के हिसाब से एनर्जी लेवल भी मेंटेन करनी पड़ती है. डिप्टी ब्रॉडकास्ट मैनेजर भास्कर प्रताप सिंह बताते हैं कि किसी भी रेडियो के लिए ट्रांसमीटर का होना बहुत जरूरी है. यह टेक्निकल बैकबोन होता है. यह आकाशवाणी परिसर में लगा होता है. वे बताते हैं आज श्रोताओं को पकड़कर रखना काफी चैलेंजिंग हो गया है.

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