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घरेलू हिंसा के खिलाफ खुद लड़ना होगा महिलाओं को

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घरेलू हिंसा के खिलाफ खुद लड़ना होगा महिलाओं को

आयुषी अग्रवाल
अभी कुछ दिन पहले ही रिश्तेदारी में किसी की मौत की खबर आयी. उनकी उम्र कुछ 65 से 70 बरस की होगी. मां से पता चला उन्होंने कुएं में कूद कर आत्महत्या कर ली थी. आत्महत्या का कारण था- घरेलू हिंसा. दरअसल इस समाज ने ही मर्दों को औरत पर अपना हुकूम चलाने और बात ना मानने पर मारपीट करने का हक दिया है. साथ ही, औरत को भी अपने खुद पर हो रहे अन्याय सहने का हक दिया है. किसी इंसान के मानसिक दुखों को अक्सर हम अनसुना कर देते हैं, क्योंकि वह हमें दिखायी नहीं देते मगर किसी इंसान की शारीरिक पीड़ा चाह कर भी अनसुनी नहीं की जा सकती है. अभी भी पितृ सत्तात्मक समाज का प्रभाव इतना है कि किसी औरत पर मर्द का हाथ उठाना भी जायज ठहरा दिया जाता है. बड़ी हैरत होती है, जब होश में भी लोगों का ऐसी हरकतें करते हुए दिल नहीं पसीजता.

स्थिति यह है कि घरेलू हिंसा की गिनती हिंसा में ही नहीं होती है, क्योंकि पत्नी है यानी अपनी प्रॉपर्टी है. उसका इस्तेमाल अपनी सहूलियत के हिसाब से किया जायेगा. उसमें उसकी रजामंदी तो कहीं जरूरी ही नहीं है. जब घरेलू हिंसा नाम का कीड़ा ही औरत को काट रहा है, तो घर के बाहर बैठे हिंसक जानवरों से औरत की सुरक्षा पर बात का कोई औचित्य ही मुझे समझ नहीं आता है. घरेलू हिंसा के मामलों को कम करने के लिए औरत को खुद अपनी लड़ाई लड़नी होगी. इसके साथ ही अगर आदमी उसे अपने पैर की जूती न समझे और उसके साथ अपने साथी की तरह बर्ताव करे, तो ऐसे मामलों में कमी आ सकती है.

अपने रिश्तेदार की आत्महत्या की खबर सुन कर लगा कि मुझे लिखना चाहिए. उन सभी महिलाओं के लिए, जो ये सब झेल रही हैं या झेलने के बाद अपनी जान गंवा चुकी हैं. मेरी मां अक्सर मुझसे कहा करती हैं- ”बुरे के साथ बुरा नहीं बना जाता”, मगर आज इसके साथ ही मुझे यह भी याद आया, ”अन्याय करने वाले से ज्यादा अन्याय सहने वाला गुनाहगार होता है.”

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