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Home लाइफस्टाइल वैचारिक सीमाओं से परे है साड़ियों का इतिहास, जानें कुछ खास

वैचारिक सीमाओं से परे है साड़ियों का इतिहास, जानें कुछ खास

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वैचारिक सीमाओं से परे है साड़ियों का इतिहास, जानें कुछ खास

अगर हम साड़ी के इतिहास को खंगालें, तो पायेंगे कि संस्कृत साहित्य में साड़ी को ‘शाटिका’ और बौद्ध साहित्य में ‘सत्तिका’ कहा गया है. सबसे पहले यजुर्वेद में परिधान के रूप में साड़ी का उल्लेख मिलता है.

ऋग्वेद की संहिता के अनुसार यज्ञ या हवन के समय पत्नी को इसे पहनने का विधान है और विधान के इसी क्रम से साड़ी जीवन का एक अभिन्न अंग बनती चली गयी. बाणभट्ट द्वारा रचित ‘कादंबरी’ और प्राचीन तमिल कविता ‘सिलप्पाधिकरम’ में भी साड़ी पहनी हुई महिलाओं का वर्णन किया गया है. महाभारत में द्रौपदी के चीर हरण का प्रसंग जगजाहिर है, ईर्ष्या और दंभ के मद में चूर दुशासन ने भरे दरबार मे सार्वजनिक रूप से उसके वस्त्र खींचे. तब भगवान श्रीकृष्ण ने साड़ी की लंबाई बढ़ा कर दौपदी की रक्षा की. इस कथा के माध्यम से यह स्थापित हो गया कि साड़ी केवल पहनावा ही नहीं है, बल्कि स्त्री की अस्मिता का प्रतीक भी है. भारतीय संस्कृति में देवियों की तस्वीरों, मूर्तियों से लेकर भारत माता की काल्पनिक छवि में साड़ी ही सर्वमान्य परिधान है. कविताओं, गीतों में धरती माता या भारत माता की प्रतिष्ठा का संकेत सदा उसके आंचल (साड़ी) से ही दिया जाता है.

साड़ियों के निर्माण और साज सज्जा में बहुत से धार्मिक संकेत चिह्नों और परंपरागत कलाओं का समावेश होता रहा है. लोक कलाकार, जिन्होंने समाज की रूढ़ियों की वजह से धर्म परिवर्तन किया था, उन्होंने कला का विस्तार करते हुए गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रयोग साड़ियों को डिजाइन करते समय किया और आज पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला अपनी विरासत नयी पीढ़ी को सौपती हुई आगे बढ़ रही है. इसी चलते साड़ियों में हिंदू, जैन तथा बौद्ध धर्म के प्रभाव को स्पष्टत: देखा जा सकता है. जिन-जिन देशों में हमारे धर्मानुयायी गये, वहां की कला में हमारे धार्मिक चिह्न दिखायी देने लगे. फिर चाहे वह इंडोनेशिया हो, पाकिस्तान या श्रीलंका, इन सभी जगहों में कलाकारी का अद्भुत साम्य देखने को मिलता है. इंडोनेशिया में जो साड़ियां बनायी जाती हैं, उनके मोटिफ आध्यात्मिक होते हैं.

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