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गर्भवती ऐसे रखें अस्थमा में अपना खास ख्याल

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गर्भवती ऐसे रखें अस्थमा में अपना खास ख्याल
डॉ अंशु जिंदल
क्लीनिकल डायरेक्टर, जिंदल अस्पताल, मेरठ, यूपी
गर्भावस्था में अक्सर महिलाओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें सांस लेने में परेशानी भी शामिल है. दमा या अस्थमा में यह परेशानी बढ़ जाती है. गर्भस्थ शिशु भी इससे प्रभावित हो सकता है. करीब 8-10 फीसदी गर्भवतियों को इस कारण कई दिक्कतें आती हैं. करीब एक-तिहाई महिलाएं गर्भावस्था के दौरान अस्थमा की चपेट में आ जाती हैं. इनमें से कुछ को खास ख्याल रखने की जरूरत होती है.
आम तौर पर गर्भावस्था की दूसरी तिमाही (24 से 36 सप्ताह) में सांस लेने में तकलीफ होती है. प्रसव का समय नजदीक आने पर यह समस्या अपने-आप कम हो जाती है.
लेकिन दमा पीड़ित गर्भवतियों की इम्यूनिटी कमजोर होने से उन्हें अधिक परेशानी होती है. फेफड़ों और श्वसन मार्ग में आये बदलावों से सांस लेने में दिक्कत आती है. सांस लेने व छोड़ने की दर बढ़ जाती है. फेफड़ों में हाइपर वेंटिलेशन शुरू हो जाती है. जोर लगाकर लंबा सांस खींचना पड़ता है. सांस लेते हुए आवाज आती है.
इस स्टेज पर कंट्रोल न करने से स्थिति क्राॅनिक स्टेज तक पहुंच सकती है. इससे गर्भवती को अस्थमा अटैक पड़ सकता है. इसका कारण है तीसरी तिमाही में गर्भवती के शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेराॅन हाॅर्मोन्स का बढ़ना. इससेे स्टेराॅॅयड का लेवल बढ़ जाता है. एस्ट्रोजन हाॅर्मोन के बढ़ने से साइनस और नाक बंद होना जैसे लक्षण दिखते हैं.
वहीं, प्रोजेस्टेराॅन हाॅर्मोन से सांस लेने में तकलीफ होती है और सांस फूलने लगती है. गर्भवती को जोर-जोर से खांसी होती है. ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, जिससे प्रीक्लेम्पसिया का खतरा बढ़ जाता है. इससे लिवर, किडनी और ब्रेन पर असर पड़ता है और गर्भस्थ शिशु को सही मात्रा में खून और आॅक्सीजन नहीं पहुंचता. इससे शिशु का विकास अवरुद्ध हो सकता है.
गर्भस्थ शिशु को खतरा
क्राॅनिक स्टेज के अस्थमा से बच्चे पर भी असर पड़ता है. उसका विकास बाधित हो सकता है. जन्म के समय वजन कम हो सकता है. बच्चे का हार्ट रेट कम हो सकता है. समय से पहले डिलीवरी हो सकती है. बच्चे के मस्तिष्क का विकास कम हो सकता है. जन्म के बाद बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है.
अस्थमा जानलेवा तब होता है, जब मां को सांस लेने में बहुत मुश्किल हो. इससे शरीर में आॅक्सीजन की कमी हो जाती है और कार्बन डाइ आॅक्साइड का लेवल बढ़ जाता है. इस स्थिति में गर्भ में पल रहे बच्चे को भी दिक्कत आ सकती है. इसकी वजह से शिशु की जान को भी खतरा हो सकता है. अत: इससे बचाव जरूरी है.
लक्षण : सीने में जकड़न, कफ की वजह से नाक बंद होना, सांस लेने में तकलीफ, जोर से सांस लेना, सांस लेते समय घरघराहट, बुरी तरह खांसी होना, अधिक थकावट, सिरदर्द, अनिद्रा की समस्या आदि.
कारण : प्रदूषण की वजह से अस्थमा का प्रकोप बढ़ा है. गर्भवतियां भी इससे अछूती नही हैं. अस्थमा को बढ़ाने में वायु प्रदूषण, धान की कटाई, धुआं, धूल-मिट्टी, फंगस, प्लांट, फूलों के पराग कण, जानवरों के रोएं, धूम्रपान और मेडिसिन से एलर्जी शामिल हैं.
जांच : गर्भवती की स्थिति और केस हिस्ट्री देखी जाती है. साथ ही डाॅक्टर पीक फ्लो, स्पायरोमेट्री टेस्ट, इमेजिंग टेस्ट और एलर्जी टेस्ट भी करते हैं.
उपचार : अस्थमा की ज्यादातर दवाइयां गर्भवती के लिए सेफ मानी जाती हैं, लेकिन डाॅक्टर से परामर्श के बाद ही दवा लेना उचित है. अस्थमा की बीटा ऐगोनिस्ट जैसी दवा और ब्रोन्कोकान्सट्रिक्शन ठीक करने वाले स्टेराॅयड इन्हेलर दिये जाते हैं. अटैक या स्थिति गंभीर होने पर मरीज को ओरल कोर्टिकोस्टेराॅयड्स भी दिये जाते हैं.
बचाव : समय-समय पर जांच कराएं – नियम से मेडिसिन लें, अस्थमा के एलर्जिक कारणों से बचें.
– भीड़-भाड़ वाले इलाकों, धूल-मिट्टी वाली जगहों पर कम जाएं. – प्रदूषण से बचने के लिए मास्क पहनें – घर की साफ-सफाई का ध्यान रखें, सफाई करते वक्त भी मास्क लगाएं. – कार में खिड़की न खोलें, एसी में वेटिलेशन मोड ऑन कर रखें – वायरल इन्फेक्शन से बचाव के लिए वैक्सीन लगवाएं – स्टीम व नेबुलाइजर का उपयोग करें
– मरीज ज्यादा पानी पीएं, ताकि गला सूखा न रहे और इन्फेक्शन्स कम हों – यूक्लिप्टस आॅयल को अपनी रूमाल में 2-3 बूंदें डाल कर सूंघते रहें.
बातचीत : रजनी अरोड़ा
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