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माता गुजरी के कुएं से श्रद्धालु ले जाते हैं पवित्र जल

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माता गुजरी के कुएं से श्रद्धालु ले जाते हैं पवित्र जल

रविशंकर उपाध्याय

पटना : सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह महाराज की जन्म स्थली तख्त हरि मंदिर साहिब परिसर में माता गुजरी जी का कुआं 320 सालों से विश्व भर के सिखों के लिए एक बेहद पवित्र परंपरा की साक्षी रही है. 1699 में जब गुरु गोविंद सिंह को तेग बहादुर सिंह जी के बाद गुरु की पदवी दी गयी उसी समय से पूरी दुनिया के सिख श्रद्धालु मानते हैं कि इस कुएं का पानी अमृत जल है.

श्रद्धालु न केवल इसका चुल्ला लेते हैं तथा अमृत जल अपने घरों को भी ले जाते है. 320 सालों से तख्त हरिमंदिर साहिब जी में कुएं के पानी को पत्थर के टैंक में जमा कर उसे पवित्र जल के रूप में श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराया जा रहा है. तख्त हरिमंदिर साहिब प्रबंधन समिति के वरिष्ठ सदस्य आरएस जीत कहते हैं कि पटना सिटी गुरुद्वारा आने के बाद अमृत जल का प्रसाद पाने और उसे अपने घरों में ले जाने की परंपरा का पालन यहां दुनिया भर से आये सिख श्रद्धालु अवश्य करते हैं. यही नहीं इसके साथ इस अमृत जल से बीमारों को स्नान कराने की भी मान्यता है जिसके कारण उनके रोग का निवारण हो जाता है.

बरसों से श्रद्धालुओं को दिया जाता है चने की घुघनी का प्रसाद

सिखिज्म के अध्येता नरेश चंद्र माथुर बताते हैं कि गुरुजी के जन्मस्थान के पास ही माता गुजरी जी का कुआं है, जिसका पानी उनके जन्म के वक्त मीठा हुआ करता था. पास-पड़ोस व दूर-दराज के लोग भी इससे जल लेने आते. बाल गोबिंद पानी ले जाती औरतों के घड़े को गुलेल से ढेले मार कर तोड़ देते. माता जी ने रोज-रोज की शिकायतें सुन कर अभिशाप दे डाला कि कल से कुएं का पानी ही खारा हो जाये. माता जी के अभिशाप से पानी खारा हो गया. अब परेशान पीड़ित महिलाओं ने विनती की कि वे अपना शाप वापस ले ले. माता जी ने कहा, जाओ एक दिन यह स्थान बहुत बड़ा तीर्थ बनेगा. यहां देश-विदेश से तीर्थ यात्री आयेंगे और इस कुएं का पानी मीठा हो जायेगा. धीरे-धीरे समय बीतता गया आैर आज भी इस कुएं का पानी मीठा है. इसी गुरुद्वारे में आज भी संगत को चने की घुघनी का प्रसाद मिलता है. इसकी कहानी भी रोचक है. माथुर बताते हैं कि हरिमंदिर गली के अंतिम छोर पर काली स्थान के पास गुरुद्वारा बाल-लीला है. राजा फतेह चंद मैनी व उनकी पत्नी रानी ऋतंभरा देवी का यह निवास स्थान था पर उनकी कोई औलाद नहीं थी. एक बार बाल गोबिंद यहां खेलते खेलते जाकर गोद में बैठ गये और कहने लगे ‘’मां मैं तुम्हारा पुत्र हूं. भूख लगी है, कुछ खाने को दो’’. उनके घर में खाने को उस समय चने की घुघनी के अलावा और कुछ नहीं था. रानी ने उनको चने की घुघनी पेश कर दी, जिसे गोबिंद राय ने प्रेम से खाया और अपने मित्रों को भी खिलाया. इसके बाद से गुरुद्वारे में आज भी संगत को चने की घुघनी का प्रसाद मिलता है.

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