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बच्चों को अच्छे-बुरे का फर्क बताएं

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बच्चों को अच्छे-बुरे का फर्क बताएं

डॉ बिन्दा सिंह

क्लिनिकल

साइकोलॉजिस्ट, पटना

रोशनी को अपनी 16 साल की बेटी से कभी यह उम्मीद नहीं कि थी कि वह इस तरह से चिल्लाकर उससे बात करेगी. छोटी-सी बिटिया कब बड़ी हो गयी, उन्हें पता ही नहीं चला. कल तक जो मां की ऊंगली पकड़ कर चलती थी, आज अचानक अपने कदम खुद बढ़ाना चाहती है.

दाेस्तों के साथ पार्टी करना, देर रात घर आना और आकर खुद को कमरे में कैद कर लेना उसकी आदत हो चली थी. समझाने पर दलीलें ऐसी कि आप चुप हो जायें. किशोरावस्था में मनमानी करना और हमउम्र से गाइड होने का चलन बढ़ा है. यहां मां को संयम से काम लेना चाहिए.

अचानक दबाव बनाना या अंकुश लगाना ठीक नहीं है. इससे वह गलत राह पर जा सकती है. डांटने के बजाय, उसे अच्छे- बुरे पक्षों के बारे में बताएं. उसे बढ़ती उम्र के बारे में समझाएं. सहेली बन कर उसका मार्गदर्शन करें. उसे यह समझाना कि इस उम्र में लड़कों की ओर आकर्षण, सामान्य बात है. धीरे-धीरे सब सामान्य हो जायेगा. इससे उनकी सोच में परिपक्वता आयेगी. दरअसल, मां बच्ची को बचपन में छोटे कपड़े पहनाती हैं और चाहती हैं कि उनकी बेटी सबसे अलग और स्मार्ट लगे.

किशोरावस्था में उन पर बंदिशें लगाना शुरू कर देती हैं. अचानक से रोक-टोक उसे बागी बना देता है. मां को बेटी नकारात्मक दृष्टि से देखने लगती है. इसलिए उनको मित्र के रूप में सही गलत के बारे में बताना जरूरी होगा.

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