[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home लाइफस्टाइल अब बदमाशों के लिए अबला नहीं ”बला” हूं मैं, सबके हक व सम्मान का है मुझे ख्याल

अब बदमाशों के लिए अबला नहीं ”बला” हूं मैं, सबके हक व सम्मान का है मुझे ख्याल

0
अब बदमाशों के लिए अबला नहीं ”बला” हूं मैं, सबके हक व सम्मान का है  मुझे ख्याल
मैं 21वी सदी कि लड़की हूं, जिसने कलयुग को सामाजिक कुरीतियों और कलंकों से मुक्त करने का जिम्मा लिया है. मैंने आज अपनी मां ही नहीं, बल्कि अपनी सास को भी झाडू-पोंछे और चूल्हे-चौके की जिंदगी से आजादी दिला कर जीने का एक नया मौका और मकसद देने का फैसला लिया है.
अब वे भी उम्र के इस पड़ाव पर कलम, डायरी और माइक पकड़ कर दुनिया के सामने अपने व्यक्तित्व के एक नये पहलू को लाने में कामयाब हो रही हैं. अब तक इन महिलाओं की पूरी जिंदगी घर-गृहस्थी संभालने और चूल्हा-चौका करने में ही बीत जाती थी. इस दौरान वे अपनी छोटी-छोटी खुशियों का गला घोंटती रहती थीं. अपनी एक अलग पहचान के लिए तरसती रह जाती थीं, लेकिन मैं उनके कल का ‘आज’ में परिवर्तन हूं. मैने मां-सास के बीच के अंतर अर्थात दोहरे नजरिये की दीवार तोड़ दी है.
मैं अपनी जन्म देनेवाली और मुझे मेरा जीवनसाथी देनेवाली मां दोनों को एक बराबर मान-सम्मान, इज्जत और प्यार देती हूं. मैने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के कारण अपने सास-ससुर और माता-पिता को अपने साथ अपने घर में रखने में आनाकानी नहीं करती, बल्कि मैं कोशिश करती हूं कि अपने दोनों घरों के माता-पिता को एक साथ एक ही छत के नीचे रखूं, ताकि उन सबका स्नेह और आशीर्वाद मुझे मिल सके.
बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार देने की भी है कोशिश
मैं आजाद भारत की बेटी आज केवल अपने घर-परिवार को ही नहीं संभाल रही, बल्कि अपने ऑफिस की जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रही हूं.
मैं केवल कला और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान के क्षेत्र में भी नित नयी ऊंचाईयां हासिल कर रही हूं. व्यस्त दिनचर्या की भाग-दौड़ के बावजूद मेरी कोशिश होती है कि मैं अपने बच्चों की गतिविधियों के बारे में पूरी जानकारी रखूं.
वे कब, कहां, कैसे और किसके साथ समय बिताते हैं, क्या करते हैं, कहां जाते-आते हैं वगैरह. मैं कोशिश करती हूं कि हर रोज उनके साथ कुछ क्वालिटी टाइम बिता सकूं. बढ़ती उम्र के साथ उनके बालमन में उठ रहे प्रश्नों का समुचित जबाव दे सकूं. उनके अंदर समुचित संस्कारों को सृजन और पोषण कर सकूं. उन्हें अपने हक के लिए आवाज उठाने के लिए सीखाने के साथ ही उन्हें अपनी जिम्मेदारियों को निभाना भी सीखा सकूं.
अब बदमाशों के लिए अबला नहीं ‘बला’ हूं मैं
अब मैं त्रैता युग की सीता या द्वापर युग कि द्रौपदी नहीं, जो अपनी लाज की रक्षा के लिए बेबस होकर कृष्ण को याद करूं. मैंने अब अपने आत्मरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठायी है. मैने तय किया है कि संकट की घड़ी में मैं मुंह छिपा कर भागूंगी नहीं, बल्कि डट कर उसका सामना करूंगी, क्योंकि मैं जान गयी हूं कि ‘भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं.’
इस कलयुग में मैं अब काली बन कर स्वयं ही दुश्मनों का संहार करने के लिए तैयार हूं. वक्त के साथ मैंने खुद में काफी बदलाव किया है. अपनी छिपी हिम्मत को पहचान लिया है. अब रास्तों पर से गुजरते वक्त कोई मनचला मुझे परेशान करता है, तो मैं सिर झुका कर उसे नजरअंदाज नहीं करती, बल्कि डट कर उसका मुकाबला करती हूं, ताकि अगली बार वह किसी राह चलती लड़की को छेड़ने से पहले सौ बार सोचे.
सैकड़ों बार इन्हीं छेड़छाड़, दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के डर से मुझे अपने अधिकारों से वंचित रहना पड़ा है. मुझसे अपनी काबिलियत दिखाने का मौका छीन लिया गया है. आत्मरक्षा के लिए मैं जूडो-कराटे सीखती हूं. एकांत रास्तों से गुजरते वक्त अपने पर्स में ब्लैक पेपर स्प्रे और लाल मिर्च पाउडर जैसे घरेलू हथियार लेकर घूमती हूं. अपने स्मार्टफोन में हमेशा जीपीएस ऑन करके रखती हूं, ताकि मेरे शुभचिंतकों को ‘मैं कहां हूं’, इसके बारे में हमेशा पता रहे.
ली है मैंने अब खुद अपनी जिम्मेदारी
मैं आज कहना चाहती हूं देश के सभी लोगों से कि बेटियों के ख्वाबों को पिंजरे में कैद करके उनकी शादी करवा देना ही हर अपराध को रोकने का एक मात्र उपाय नहीं है.
अगर ऐसा होता, तो क्यों विवाहित महिलाएं भी बलात्कार का शिकार बनतीं. दरअसल मुसीबतों से मुंह छुपा कर भागना और यह स्वांग करना कि हमने मुसीबतों से छुटकारा पा लिया है यही हमारी सबसे बड़ी भूल है. बजाय इसके हमें उनका डट कर हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए, ताकि वे हम पर हावी होने के बजाय हमारे आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जायें.
मैंने ठान लिया है कि अब ऐसी किसी भी अनहोनी को अपनी सफलता के आड़े नहीं आने दूंगी. जो अपराध मैंने नहीं किया, उसके लिए कभी खुद को दोषी नहीं मानूंगी. अपने आत्मसम्मान पूरे दम-खम के साथ लड़ूंगी और मुझे यकीन है कि इस देश की समस्त जनता मेरी इस लड़ाई में मेरा साथ जरूर देगी.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel