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Home Life and Style क्यों कभी खत्म नहीं होती इंसान की इच्छाएं? प्रेमानंद जी महाराज का हैरान करने वाला खुलासा

क्यों कभी खत्म नहीं होती इंसान की इच्छाएं? प्रेमानंद जी महाराज का हैरान करने वाला खुलासा

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क्यों कभी खत्म नहीं होती इंसान की इच्छाएं? प्रेमानंद जी महाराज का हैरान करने वाला खुलासा
भक्ति और इच्छाओं पर प्रेमानंद जी महाराज के आध्यात्मिक विचार

Premanand Ji Maharaj Spiritual Quotes on Bhakti and Desires: प्रेमानंद जी महाराज अक्सर अपने प्रवचनों में बताते हैं कि मनुष्य की अशांति का सबसे बड़ा कारण उसकी अनंत इच्छाएं हैं. मन जितना पाता है, उतना ही और पाने की चाह बढ़ती जाती है. इसी विषय पर उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य इच्छाओं के पीछे भागता रहेगा, तब तक उसे सच्ची शांति और संतोष नहीं मिल सकता. जीवन का वास्तविक आनंद त्याग, भक्ति और ईश्वर स्मरण में ही छिपा है.

प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि अधूरी इच्छाएं मन को बेचैन बना देती हैं. मनुष्य चाहता है कि या तो उसकी सभी इच्छाएं पूरी हो जाएं या फिर वे पूरी तरह समाप्त हो जाएं. लेकिन संसार में इच्छाओं की पूर्ति कभी पूर्ण नहीं होती.

मनुष्य चाहे कितना भी धन, सुंदरता, प्रतिष्ठा या सुख क्यों न प्राप्त कर ले, मन की तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती. – प्रेमानंद जी महाराज

राजा ययाति की कथा से समझाया जीवन का सत्य

महाराज ने पुराणों में वर्णित राजा King Yayati का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने हजारों वर्षों तक भोग-विलास का आनंद लिया. यहां तक कि उन्होंने अपनी आयु भी बढ़ा ली ताकि और अधिक सुख भोग सकें.लेकिन अंत में ययाति ने स्वीकार किया-

भोगों से कभी तृप्ति नहीं होती, जैसे आग में घी डालने से वह और भड़कती है.

त्याग में छिपा है शांति का राज

प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार इच्छाओं को पूरा करने से नहीं, बल्कि उनका त्याग करने से शांति मिलती है. जब मनुष्य संसार की मोह-माया से ऊपर उठकर भक्ति में लग जाता है, तभी उसे वास्तविक संतोष मिलता है.

शांति भोग में नहीं, त्याग में है. जो जितना त्याग करता है, वह उतना ही भीतर से शांत होता है. – प्रेमानंद जी महाराज

महाराज ने यह भी कहा कि मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि जब सारी इच्छाएं पूरी हो जाएंगी तब भजन करेंगे. बल्कि अभी से ईश्वर का स्मरण और भक्ति प्रारंभ करनी चाहिए.

भगवान से धन, सुख या वैभव नहीं मांगो, उनसे अविरल भक्ति और अखंड स्मरण मांगो. – प्रेमानंद जी महाराज

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