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Home Life and Style बच्चे को कब डायपर पहनाना चाहिए और कब नहीं? जानिए ज्यादातर पैरेंट्स कहां कर देते हैं गलती

बच्चे को कब डायपर पहनाना चाहिए और कब नहीं? जानिए ज्यादातर पैरेंट्स कहां कर देते हैं गलती

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बच्चे को कब डायपर पहनाना चाहिए और कब नहीं? जानिए ज्यादातर पैरेंट्स कहां कर देते हैं गलती
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Parenting Tips: आज के समय में छोटे बच्चों के माता-पिता डायपर पर काफी ज्यादा निर्भर रहने लगे हैं, क्योंकि ये उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. जब पैरेंट्स बच्चे को डायपर पहना देते हैं तो वह बिस्तर भी गीला नहीं करता है और साथ ही उसे बार-बार कपड़े बदलवाने की जरूरत भी नहीं पड़ती है. लेकिन हर एक चीज की तरह इसके भी दो पहलू हैं. अगर आप डायपर का जरूरत से ज्यादा या फिर गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं, तो इसकी वजह से बच्चे की नाजुक स्किन को नुकसान भी हो सकता है. अगर आप भी अपने बच्चे को हर समय डायपर पहनकर रखते हैं, तो आज की इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद शायद आप ऐसा करना बंद कर दें. आज हम आपको काफी आसान शब्दों में समझाने वाले हैं कि आपको अपने बच्चे को कम डायपर पहनाना चाहिए और कब नहीं. तो चलिए समझते हैं इसके बारे में बेहद ही आसान शब्दों में.

बच्चे को कब डायपर पहनाना सही है?

  • रात को सोते समय: बच्चे को रात में डायपर पहनाना सबसे अच्छा ऑप्शन है. इससे बच्चा पूरी रात गीलेपन से दूर रहता है और उसकी नींद खराब नहीं होती. जब बच्चे की नींद पूरी होगी, तो वह अगली सुबह खुशमिजाज और एक्टिव रहेगा.
  • घर से बाहर जाते समय: अगर आप बच्चे को लेकर किसी पार्टी, बाजार या डॉक्टर के पास जा रहे हैं, तो डायपर पहनाना बहुत जरूरी हो जाता है. इससे ट्रैवल करते समय कपड़े खराब होने का डर नहीं रहता और आप बिना किसी टेंशन के बाहर जा सकते हैं.
  • सर्दियों और बरसात के मौसम में: ठंड के दिनों में छोटे बच्चे बार-बार पेशाब करते हैं. ऐसे में बार-बार कपड़े बदलना और उन्हें सुखाना मुश्किल हो जाता है. इस मौसम में डायपर बच्चे को ठंड और मॉइस्चर से बचाने में मदद करता है.
  • वैक्सीनेशन या बीमारी के दौरान: जब बच्चे को वैक्सीन लगती है या उसकी तबियत खराब रहती है, तो उसे ज्यादा आराम की जरूरत होती है. बार-बार कपड़े बदलने से उसकी चिड़चिड़ाहट बढ़ सकती है, इसलिए ऐसे समय में डायपर एक अच्छा सहारा है.

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बच्चे को डायपर कब नहीं पहनाना चाहिए?

  • घर के अंदर रहते समय: जब आप बच्चे के साथ घर पर हों, तो कोशिश करें कि उसे कॉटन की लंगोट या पजामा पहनाएं. इससे बच्चे की स्किन को खुलकर सांस लेने का मौका मिलता है.
  • डायपर रैशेज होने पर: अगर बच्चे की जांघों या प्राइवेट पार्ट के आसपास लाल दाने या रैशेज दिखें, तो तुरंत डायपर का इस्तेमाल करना बंद कर दें. इस दौरान स्किन को सूखा और हवादार रखना सबसे ज्यादा जरूरी होता है.
  • गर्मियों के मौसम में: तेज गर्मी और उमस के दिनों में डायपर के अंदर पसीना जमा हो जाता है, जिससे बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए गर्मियों में डायपर का इस्तेमाल कम से कम करें.
  • पॉटी ट्रेनिंग के दौरान: जब आपका बच्चा 1.5 से 2 साल का हो जाए और आप उसे टॉयलेट ट्रेनिंग दे रहे हों, तब दिन के समय डायपर न पहनाएं. इससे बच्चे को गीलेपन का अहसास होगा और वह खुद टॉयलेट जाने की आदत सीखेगा.

माता-पिता के लिए कुछ जरूरी बातें

बच्चों को डायपर पहनाते समय कुछ सावधानियों का ख्याल रखना बहुत जरूरी है. बच्चे के लिए हमेशा सही साइज का डायपर चुनें, जो न ज्यादा टाइट हो और न ज्यादा ढीला. इसके अलावा हर 4 से 5 घंटे में डायपर जरूर बदलें, चाहे वह पूरी तरह भरा हो या नहीं. डायपर बदलने के बाद उस जगह को साफ और सूखा रखें और रैश क्रीम या नारियल तेल का इस्तेमाल जरूर करें. याद रखें, डायपर आपकी सुविधा के लिए है, लेकिन बच्चे के स्किन की सुरक्षा सबसे पहले है. दिन में कुछ घंटे बच्चे को ‘डायपर-फ्री टाइम’ जरूर दें ताकि उनकी स्किन हेल्दी और सॉफ्ट बनी रहे.

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सौरभ पोद्दार एक लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट हैं और पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया में एक्टिव हैं. उन्होंने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है. फिलहाल, सौरभ 'प्रभात खबर' के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रहे हैं. सौरभ को उन विषयों पर लिखना सबसे ज्यादा पसंद है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. उनके आर्टिकल्स में आपको हेल्थ, फिटनेस, स्किन-हेयर केयर, पेरेंटिंग, हेल्दी रेसिपीज, घरेलू नुस्खे, रिलेशनशिप और वास्तु शास्त्र जैसी उपयोगी जानकारियां मिलेंगी. फिटनेस और अच्छी सेहत सौरभ की निजी जिंदगी का भी अहम हिस्सा हैं. वे जिन विषयों पर लिखते हैं, उन्हें अपनी रूटीन में फॉलो भी करते हैं. उनका मानना है कि जब आप किसी चीज को खुद एक्सपीरियंस करते हैं, तभी दूसरों तक सही और प्रैक्टिकल जानकारी पहुंचा सकते हैं. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि वे ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की भाषा में लिखें, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके. यही वजह है कि उनके लिखे आर्टिकल्स काफी एंगेजिंग और एसईओ फ्रेंडली होते हैं.
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