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Home Entertainment irrfan khan death anniversary:मंटो फिल्म के लिए नंदिता दास के सामने इरफान ने रखी थी ये शर्त

irrfan khan death anniversary:मंटो फिल्म के लिए नंदिता दास के सामने इरफान ने रखी थी ये शर्त

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irrfan khan death anniversary:मंटो फिल्म के लिए नंदिता दास के सामने इरफान ने रखी थी ये शर्त
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irrfan khan death anniversary :लीजेंड एक्टर इरफान खान की आज पांचवीं पुण्यतिथि है. एक्टर,राइटर और कास्टिंग डायरेक्टर श्रीधर दुबे इरफान के साथ बिताए हुए खास पलों की यादों को उर्मिला कोरी के साथ सांझा किया.बातचीत के प्रमुख अंश 

इरफान भाई के कालखंड में चला जाता हूं 

इरफान भाई मुकम्मल एक्टर थे. उन्होंने हर तरह की फिल्में की है. एक किरदार दूसरे किरदार से बिल्कुल अलग,लेकिन कमी खल ही जाती है,जब हम कोई स्क्रिप्ट लिखते हैं और हमें लगता है कि इरफ़ान भाई इसे बहुत अच्छा कर सकते हैं और फिर अचानक से याद आता है कि अब वह नहीं हैं.इन पांच सालों में ऐसा कई बार हुआ है. राइटर के साथ -साथ मैं एक्टर भी हूं तो कई बार किसी फ़िल्म को देखते हुए इरफान भाई के कालखंड में चला जाता हूं कि इरफान भाई अगर इस फ़िल्म और किरदार को करते तो कैसा करते थे.

बीमारी ने उनको मजबूत बनाया था 

मरना सबको है .ये सभी को पता है ,लेकिन जब आपको मालूम पड़े कि आपको लाइलाज बीमारी हो गई है और आपके पास बहुत कम वक्त है तो आप सबकुछ समेटना चाहते हैं.इरफान भाई जिस शक्सियत के मालिक थे,जब उन्हें मालूम पड़ा तो वह इंटरनली बहुत कुछ बटोरने लगे थे .उनमें एक अलग ही किस्म की मजबूती दिखती थी.उसके लिए मैं सुतापा भाभी को भी क्रेडिट देना चाहूंगा.वे बहुत लकी थे कि उन्हें ऐसी पत्नी मिली थी.बीमारी से पहले हुई मुलाकातों में वह एक्टिंग के बारे में बहुत बात करते थे .अभिनय से जुड़ी और उसके आसपास की बातें करते थे .बीमारी के बाद जिंदगी से जुड़ी फिलॉसफी पर वह बात करते हुए कहते थे कि जिंदगी को भागकर नहीं बल्कि ठहरकर जीने का नाम है.जो हम कभी वक्त पर समझ नहीं पाते हैं .

पहली मुलाकात 

मैं उनके सर्कल के लोगों से जुड़ा था,तो उनसे भी जुड़ गया. तिग्मांशु धुलिया और निशिकांत कामत के यहां मैं जाता रहता था. पहली मुलाकात पानसिंह तोमर फ़िल्म के पोस्टर लांच पर एक छोटी सी चाय पार्टी में हुई थी.फ़िल्म  कई सालों से रिलीज को तरस रही थी. जब रिलीज होने जा रही थी तो उसी ख़ुशी में चाय बिस्कुट की पार्टी रखी थी . वही पहली बार इरफ़ान भाई से मिला था .उसके बाद फ़िल्म डी डे में मैं कास्टिंग डायरेक्टर बना तो मुलाक़ातें और बढ़ गयी.फ़िल्म मदारी के लिए तो रोज़ ही मिलना होने लगा था. वह फ़िल्म उन्हें बेहद पसंद थी इसलिए वह हर दिन उसकी रीडिंग और रिहर्सल का हिस्सा बनते थे.उनके साथ स्क्रीन शेयर ना करने का हमेशा अफ़सोस रहेगा. मैं बताना चाहूंगा कि इतने सालों की मुलाक़ात के बावजूद हमारी बस एक ही तस्वीर है .उनका क्या था कि हाथ पकड़कर बात करते थे . उनका क्या भइया कहकर बात करने का अंदाज था .तस्वीर ज़्यादा खिंचवाते नहीं थे . हां तिग्मांशु धुलिया की एक होली पार्टी में हम सभी रंगों से रंगे थे तो उन्होंने कहा कि इस अंदाज़ में तस्वीर तो बनती है .बस वही हमारी साथ की तस्वीर है लेकिन यादें ढेर सारी हैं .

जबरदस्त ह्यूमर था

इरफान भाई संजीदा रोल करते थे लेकिन असल ज़िदगी में उनका ह्यूमर जबरदस्त था. एक तो वह अपनी गहरी आंखों से अपना शिकार देख लेते थे. उसके बाद उनका ह्यूमर पंच एक के बाद एक शुरू हो जाता था .जिनका कोई तोड़ नहीं होता था .

इरफान भाई खुद को कन्वर्टेड मुस्लिम बताते थे 

तिग्मांशु धूलिया की पार्टियों में मटन बहुत ही अभिन्न हिस्सा होता है ,जिसका टेस्ट भी गजब होता है .तिशु भाई सभी को मटन और खाने को कहते रहते थे. मैंने देखा कि इरफान भाई को पूछ तक नहीं रहे हैं . मैंने बोला भैया मैं लाकर दूं तो उन्होंने बताया कि सभी को लगता है कि मुझे नॉन वेज बहुत पसंद होगा लेकिन मुझे नॉन वेज नहीं पसंद है . मैं यहां बताना चाहूंगा कि वह ख़ुद को हिंदू ही बताते थे.वह कहते थे कि हम लोग कन्वर्टेड मुस्लिम हैं .हमारे पुरखे दादे सभी राजस्थान के टोंक से हैं और वहाँ सभी हिंदू ही थे 

मंटो फ़िल्म के लिए नंदिता नहीं मना पायी 

मंटो की कास्टिंग टीम से मैं जुड़ा था . उस फ़िल्म की निर्देशिका नंदिता जी की पहली पसंद इरफान भाई ही थे . फ़िल्म के कुछ ड्राफ्ट लिखने के बाद वह इरफ़ान भाई से मीटिंग के लिए गई थी. उनके साथ मैं भी गया था .आधे घंटे का टाइम थे,लेकिन यह मीटिंग दो घंटे तक चली थी.जिसमे सिर्फ़ इरफ़ान भाई ही बोल रहे थे और नंदिता बोल रही थी कि हां मैं ये भी एड करने की सोच रही थी .उन्होंने ये कहा कि तुम ये मत सोचना कि मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूं कि मुझे मंटो के बारे में तुमसे ज़्यादा पता है .तुम हमसे कई ज्यादा उनसे प्रेम करती हो,तभी तुम उसपर फ़िल्म बनाना चाहती हो ,लेकिन तुम अगर मंटो ऐसा देख पाती हो जैसे मैं देख सकता हूं तो ही मैं उसे करना चाहूंगा. ना भूतो ना भविष्य ते वाली उनकी फिलोसफी मंटो के किरदार के लिए थी. आमतौर पर जब आप किसी को पसंद करते हैं, तो उनसे जुड़ा काम तुरंत हां कह देते हैं ,लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं था.उनकी शर्त थी कि मंटो में इतना डूब कर आओगे तो ही हम इस फ़िल्म को करेंगे .कई बार मिलने और बातचीत के बावजूद नंदिता उन्हें फ़िल्म के लिया मना नहीं पायी,जिसके बाद नवाज भाई को फिल्म मिली


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