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Home Entertainment Chand Mera Dil Review: आज के दौर के रिश्तों का कड़वा सच बयां करती है ‘चाँद मेरा दिल’, अनन्या और लक्ष्य के इंटेंस ट्रांसफॉर्मेशन ने जीता दिल

Chand Mera Dil Review: आज के दौर के रिश्तों का कड़वा सच बयां करती है ‘चाँद मेरा दिल’, अनन्या और लक्ष्य के इंटेंस ट्रांसफॉर्मेशन ने जीता दिल

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Chand Mera Dil Review: आज के दौर के रिश्तों का कड़वा सच बयां करती है ‘चाँद मेरा दिल’, अनन्या और लक्ष्य के इंटेंस ट्रांसफॉर्मेशन ने जीता दिल
'चांद मेरा दिल' रिव्यू, फोटो - इंस्टाग्राम

फिल्म: चाँद मेरा दिल
निर्देशक: विवेक सोनी
मुख्य कलाकार: लक्ष्य, अनन्या पांडे, और अन्य
जॉनर: इंटेंस साइकोलॉजिकल-रोमांटिक ड्रामा
रेटिंग: 4/5

Chand Mera Dil Review: बॉलीवुड में अक्सर प्यार को बहुत खूबसूरत और आसान दिखाया जाता है, लेकिन डायरेक्टर विवेक सोनी की नई फिल्म ‘चाँद मेरा दिल’ इस ढर्रे को पूरी तरह बदल देती है. यह फिल्म उन लोगों की सोच पर एक कड़ा तमाचा है जो सिनेमाघरों में सिर्फ काल्पनिक सुख और नकली मुस्कान वाली कहानियाँ देखने जाते हैं. विवेक सोनी ने इस फिल्म को किसी आम ‘बॉय मीट्स गर्ल’ की लव स्टोरी की तरह नहीं बनाया है, बल्कि उन्होंने आज की युवा पीढ़ी के उस मानसिक तनाव, अधूरे सपनों और पहचान की लड़ाई को सामने रखा है, जिससे आज का युवा चुपचाप जूझ रहा है.

क्या है फिल्म की कहानी? (मुख्य प्लॉट)

फिल्म की कहानी आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या पांडे) नाम के दो कॉलेज स्टूडेंट्स के इर्द-गिर्द घूमती है. शुरुआत में दोनों के बीच एक बेहद गहरा और जुनूनी रोमांस देखने को मिलता है, जहाँ रात-रात भर फोन पर बातें करना और यह मानना शामिल है कि उनका प्यार दुनिया में सबसे ऊपर है. लेकिन असली मोड़ तब आता है जब वे कॉलेज की दुनिया से बाहर निकलकर असल ज़िंदगी का सामना करते हैं.

  • आरव का दर्द: मध्यमवर्गीय परिवार के आरव को करियर की रेस में बार-बार रिजेक्शन और पैसों की तंगी झेलनी पड़ती है. इस दबाव के कारण उसका मासूम स्वभाव चिड़चिड़े और गुस्से से भरे इंसान में बदल जाता है, जो अपनी नाकामी का गुस्सा अनजाने में चांदनी पर निकालने लगता है.
  • चांदनी का अतीत: चांदनी की ज़िंदगी और भी ज्यादा डार्क है. वह बचपन में अपने ही घर में हुई घरेलू हिंसा (डोमेस्टिक वायलेंस) की गवाह रही है, जिसकी वजह से वह किसी भी रिश्ते में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती.

जब ये दो अंदर से टूटे हुए लोग एक साथ आते हैं, तो उनका प्यार एक ऐसे इमोशनल चक्रव्यूह में बदल जाता है, जहाँ दोनों एक-दूसरे को तबाह करने लगते हैं.

लक्ष्य और अनन्या की एक्टिंग बनी फिल्म की जान

इस फिल्म की सबसे बड़ी जान इसके लीड एक्टर्स की परफॉर्मेंस है:

  • लक्ष्य की बेहतरीन एक्टिंग: लक्ष्य ने आरव के रोल में बहुत मैच्योरिटी दिखाई है. उन्होंने अपने किरदार के गुस्से को चिल्लाकर नहीं, बल्कि एक शांत और ठंडे फ्रस्ट्रेशन के जरिए पेश किया है. कई सीन्स में वे बिना कुछ बोले सिर्फ अपनी आँखों की बेबसी से दर्शकों का दिल दुखा देते हैं.
  • अनन्या पांडे का मेकओवर: अनन्या पांडे ने इस फिल्म से अपनी पुरानी ‘चॉकलेट गर्ल’ वाली इमेज को पूरी तरह तोड़ दिया है. यह उनके करियर का सबसे मुश्किल और संजीदा रोल है. उन्होंने एक ऐसी लड़की के मानसिक आघात (ट्रॉमा) को जिया है जो अंदर से पूरी तरह बिखर चुकी है. दोनों के बीच का तनाव इस रोमांटिक फिल्म को एक साइकोलॉजिकल ड्रामा के लेवल पर ले जाता है.

डायरेक्शन, राइटिंग और संगीत का जादू

विवेक सोनी का निर्देशन बेहद कड़क है और फिल्म की कहानी कहीं भी बिखरती नहीं है. फिल्म के डायलॉग्स आज की आम बोलचाल की भाषा जैसे हैं, जो सीधे दिल पर लगते हैं. तकनीकी तौर पर फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर इसे और गहरा बनाता है. फिल्म के सेकेंड हाफ और क्लाइमेक्स में श्रेया घोषाल की आवाज में गाया गया टाइटल ट्रैक पूरे थिएटर में एक अजीब सी खामोशी और सुन्नता भर देता है, जो किरदारों की बेबसी को साफ बयां करता है.

फिल्म में क्या कमी रही?

फिल्म की एकमात्र कमी इसका बहुत ज्यादा भारी और इमोशनली हैवी मिजाज है. लगातार पर्दे पर दुख, निराशा और टूटते रिश्तों को देखना आम दर्शकों के लिए मानसिक रूप से थोड़ा थका देने वाला हो सकता है. इसके अलावा, फिल्म का दूसरा भाग (सेकेंड हाफ) कुछ जगहों पर थोड़ा धीमा पड़ता है, जिसे एडिटिंग के दौरान थोड़ा और छोटा किया जा सकता था.

फाइनल वर्डिक्ट: आपको देखनी चाहिए या नहीं?

अगर आप थिएटर्स में सिर्फ टाइमपास, नाच-गाना और दिमाग को रिलैक्स करने के लिए जाते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए बिल्कुल नहीं है. लेकिन अगर आप आधुनिक जीवन और आज के रिश्तों का कड़वा और व्यावहारिक सच बिना किसी फिल्टर के देखना चाहते हैं, तो ‘चाँद मेरा दिल’ इस साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है. लक्ष्य और अनन्या पांडे की असाधारण एक्टिंग के लिए इसे बड़े पर्दे पर एक बार जरूर देखा जाना चाहिए.

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शीतल चौबे एक एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट हैं, जो बॉलीवुड, साउथ सिनेमा, बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट्स, ओटीटी रिलीज, फिल्मी गॉसिप्स, ट्रेंडिंग विवाद और सेलेब्रिटी इंटरव्यूज पर सक्रिय रूप से काम करती हैं. उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हर हलचल पर नजर रखना पसंद है, चाहे वो किसी फिल्म की कमाई हो, नया रिकॉर्ड हो, या फिर किसी वेब सीरीज का ओटीटी पर धमाका. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बदलते ट्रेंड्स को समझना और उन्हें आसान, दिलचस्प और रीडर-फ्रेंडली भाषा में ऑडियंस तक पहुंचाना उनकी खासियत है. उनका फोकस ऐसी खबरों पर रहता है जो न सिर्फ जानकारी दें, बल्कि पाठकों को स्क्रॉल रोकने पर मजबूर कर दें. मूल रूप से बिहार के बक्सर की रहने वाली शीतल की शुरुआती पढ़ाई उत्तर प्रदेश के कानपुर से हुई. इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन किया. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शब्द सांची से की, जहां उन्होंने एजुकेशन और एंटरटेनमेंट दोनों बीट्स पर काम किया. यहां उन्होंने कंटेंट राइटिंग के साथ वॉइस ओवर और Adobe Premiere Pro पर बेसिक वीडियो एडिटिंग की स्किल भी हासिल की. करीब एक साल के अनुभव के बाद 2024 में वह प्रभात खबर डिजिटल से जुड़ीं, जहां वह वर्तमान में बॉक्स ऑफिस, बॉलीवुड, साउथ सिनेमा और एंटरटेनमेंट से जुड़ी खबरों पर सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. वह लगातार डिजिटल मीडिया में खुद को अपडेट करते हुए एंटरटेनमेंट जर्नलिज्म में अपनी एक मजबूत पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं.
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