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Cannes Film Festival 2026:पलामू की मिट्टी में बनी फिल्म ‘पेड़ चलता है ‘पहुंची कान फिल्म फेस्टिवल

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Cannes Film Festival 2026:पलामू की मिट्टी में बनी फिल्म ‘पेड़ चलता है ‘पहुंची कान फिल्म फेस्टिवल

cannes film festival 2026 :झारखंड के पलामू की एक कहानी अब वैश्विक मंच तक पहुंच चुकी है. 14 मई को पलामू के लिए गर्व का पल तब आया, जब यहां शूट हुई हिंदी फिल्म ‘पेड़ चलता है’ का प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल के वर्ल्ड प्रीमियर कैटेगरी में प्रदर्शन हुआ. प्राकृतिक सुंदरता, लोक संवेदनाओं व स्थानीय कहानियों से सजी इस फिल्म की कान तक की यात्रा को इसके मेकर्स किसी सपने के सच होने जैसा मानते हैं. फिल्म की मेकिंग और कान फिल्म फेस्टिवल तक पहुंचने की इस खास यात्रा पर फिल्म के निर्देशक देबादित्य बंधोपाध्याय की उर्मिला कोरी से हुई बातचीत .

फिल्म में सिर्फ झारखंड के लोकेशन्स ही नहीं, एक्टर्स व भाषा भी शामिल

ये फिल्म जंगल के साथ-साथ वहां से जुड़े लोगों की कहानी भी है. मैं भारत के कई जंगलों में गया हूं, पर झारखंड के जंगल और वहां के खूबसूरत आदिवासी गांवों की बात ही कुछ और है, इसलिए हमने अपनी फिल्म के लिए झारखंड को चुना. फिल्म की शूटिंग 17 दिनों में पलामू व लातेहार में पूरी हुई. मुख्य शूटिंग बेतला फॉरेस्ट के चार-पांच किमी के दायरे में हुई, जबकि मारामार के सुरकुनी गांव, पलामू के दोनों किलों, डाल्टनगंज के सरकारी दफ्तरों और केतकी नदी किनारे भी कई दृश्य फिल्माये गये. फिल्म में सिर्फ यहां के लोकेशन्स ही नहीं, बल्कि यहां के थिएटर कलाकारों को भी शामिल किया गया है. फिल्म के फाइट मास्टर सुमित वर्मन पहले झारखंड में होने वाली हिंदी फिल्मों की शूटिंग में असिस्ट करते थे, पर इस फिल्म से वह खुद फाइट मास्टर बन गये हैं. उनका काम पसंद आने पर मुंबई से किसी फाइट मास्टर को बुलाने के बजाय उन्हें ही मौका दिया गया. फिल्म में हिंदी के साथ मगही व नागपुरी का भी इस्तेमाल किया गया है.

जंगल में शूटिंग नहीं था आसान

जंगल में शूटिंग करना बिल्कुल आसान नहीं था और उससे जुड़ी कई कहानियां हैं. झारखंड का बक्सा मोड़ इलाका एलिफेंट कॉरिडोर के बेहद करीब है. वहां शूटिंग के दौरान अचानक वनकर्मी पहुंचे और बताया कि करीब 100 मीटर की दूरी पर हाथियों का झुंड आ गया है, इसलिए बिना शोर किये शूटिंग रोकनी होगी, वरना हादसा हो सकता है. उस वक्त डर का माहौल था और टीम धीरे-धीरे सामान समेट रही थी. तभी एक और वनकर्मी ने आकर बताया कि हाथियों का झुंड दूसरे रास्ते से निकल गया है. ऐसे में इस फिल्म की मेकिंग में सिर्फ इंसानों ने ही नहीं, जानवरों ने भी मदद की.

पर्यावरण संरक्षण की सीख देती है यह फिल्म

पर्यावरण संरक्षण यही फिल्म का थीम है, पर इसे हॉरर-थ्रिलर जॉनर के जरिये बेहद दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है. वे कहते हैं, प्रकृति के साथ खिलवाड़ इंसान को बड़ी मुश्किल में डाल सकता है. सोचिए, अगर पेड़ चल सकते, तो वे कटते नहीं और उन्हें काटने वालों पर हमला भी कर सकते थे. फिल्म में इस विचार को बेहद प्रभावी ढंग से दिखाया गया है. यह फिल्म इंसान और प्रकृति के बीच के मजबूत रिश्ते को रेखांकित करती है.

शूटिंग के दौरान एक्टर्स को भूखा तक रहना पड़ा

फिल्म की शूटिंग के दौरान खाने को लेकर भी कई चुनौतियां सामने आयीं. टीम जहां ठहरी हुई थी, वहीं खाना बनता था और फिर उसे जंगल में शूटिंग लोकेशन तक पहुंचाया जाता था. जंगल का रास्ता दुर्गम होने की वजह से कई बार खाना पहुंचने में देर हो जाती थी. एक दिन सुरकुनी में शूटिंग के दौरान कास्ट के कई लोगों को समय पर खाना नहीं मिल पाया. दरअसल, वहां मौजूद स्थानीय लोगों को भी हमने खाने के लिए बुला लिया था, जिससे खाना कम पड़ गया. दोबारा खाना बनकर आने में समय लग रहा था. ऐसे में एक्टर्स ने इंतजार करने के बजाय शूटिंग जारी रखने का फैसला किया. कलाकारों ने पूरी शूटिंग के दौरान काफी सहयोग किया. उन्हें पहले से पता था कि वहां वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं नहीं मिलेंगी और कई दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन वे एक अच्छी फिल्म का हिस्सा बनना चाहते थे.

झारखंड सरकार और स्थानीय लोगों का आभार

फिल्म की मेकिंग में सहयोग के लिए मैं झारखंड के लोगों से लेकर प्रशासन तक सभी का शुक्रगुजार हूं. सभी ने फिल्म की शूटिंग व निर्माण में भरपूर सहयोग दिया. क्योंकि, शूटिंग के लिए हर तरह की जरूरी अनुमति आसानी से मिल गयी. फिल्म में दिखाये गये ज्यादातर सरकारी दफ्तर रियल हैं. जंगल में शूटिंग के दौरान वन विभाग के कर्मियों ने भी टीम की काफी मदद की. रियल लोकेशन मिलने से फिल्म ज्यादा रियल बनती है और बजट संभालने में भी मदद मिलती है, जिससे काम आसानी से आगे बढ़ता है. स्थानीय लोग बेहद मददगार और मिलनसार थे. कई बार भाषा की दिक्कतें आयीं, पर लोगों ने हर संभव सहयोग दिया.

इस तरह कान फिल्म फेस्टिवल तक पहुंची फिल्म

फिल्म बनने के बाद हमें लगा कि इसकी कहानी और प्रस्तुति बड़े मंच तक पहुंचनी चाहिए. इसी सोच के साथ हमने फिल्म को कान फिल्म फेस्टिवल में भेजने का फैसला किया. फिल्म को अंग्रेजी सबटाइटल के साथ-साथ फ्रेंच सबटाइटल में भी भेजना पड़ा. इसके बाद फिल्म के प्रीमियर के लिए चयन हो गया.हालाँकि हम उसमें शामिल नहीं हो पाए। बजट की कमी और ओटीटी रिलीज की तैयारियों के कारण हमारी टीम कान नहीं जा सकी, क्योंकि वहां जाना काफी खर्चीला है. हालांकि, मुझे खुशी है कि मेरी फिल्म अब वैश्विक मंच तक पहुंच गयी है, जहां बड़े फिल्मकार, कलाकार और दर्शक इसे देखेंगे. फिल्म कान के सिनेन्दो ऐप पर भी उपलब्ध होगी. अब मुझे दर्शकों की प्रतिक्रिया का इंतजार है.


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