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अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं टीवी सीरियल्स

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अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं टीवी सीरियल्स

साइंस इस बात को काफी पहले ही साबित कर चुका है कि भूत, प्रेत, चुड़ैल या डायन जैसी कोई चीज होती ही नहीं है. लेकिन टीवी ऑन करते ही विभिन्न चैनलों पर ये दिख जाते हैं. पिछले कुछ समय से विभिन्न चैनलों पर अविश्वसनीय घटनाओं, भूत-प्रेत, डायन, चामत्कारिक और काल्पनिक घटनाओं पर आधारित सीरियलों का प्रसारण हो रहा है. इनसे न केवल बच्चों के मन और मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि अंधविश्वास के कारण होने वाली घटनाएं बढ़ी हैं. बच्चे कई बार इन में दिखायी गयी काल्पनिक कहानियों को सच मान लेते हैं.

अंधविश्वासों को देखकर कुछ लोग उन्हें सच मान बैठते हैं

जहां एक ओर सरकार और कई गैर सरकारी संगठन सुदूर गांवों में भी डायन प्रथा जैसे अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता फैला रहे हैं. वहीं इस तरह के सीरियलों में डायन के कैरेक्टर को दिखा लोगों बेवकूफ बनाया जाता है. टीवी पर अंधविश्वासों को देख लोग उन्हें सच मान बैठते हैं. यही कारण है कि आज भी सुनने में आता है कि किसी गांव में डायन के नामक पर किसी महिला की हत्या हो गयी. इसका एक अलग इम्पैकट लोगों में पड़ रहा है. पाटलिपुत्र कॉलोनी की रहने वाली इंदिरा बताती हैं कि वे डायन व काले जादू में विश्वास नहीं करती हैं लेकिन में विजुअल इफेक्ट्स और कुछ बातें उन्हें इसे देखने में आकर्षित करती हैं.

डायन से लेकर पिशाच तक की कहानियों को दिखाया जा रहा है

एक्सपर्ट कहते हैं कि अंधविश्वास को बढ़ाते ये टीवी सीरियल केबल टेलीविजन नेटवर्क्‍स अधिनियम 1995 का उल्लंघन भी कर रहे हैं. उनका मानना है कि सायंस के इस दौर में जहां हम चांद पर रहने की बात कर रहे हैं, मार्स में पानी ढूंढ रहें वहीं दूसरी ओर समाज के एक बड़े तबके में अंधविश्वास अपनी जड़े मजबूत किये बैठा है. इन जड़ों को मजबूती टीवी चैनलों में आने वाले सारे सीरियल दे रहे हैं. इनमें जी टीवी पर वीकेंड पर आने वाला सीरियल अघोरी, स्टार प्लस पर आने वाला सीरियल नजर, दिव्य-दृष्टी और एंड टीवी पर वीकेंड में डायन और लाल इश्क, कलर्स पर आने वाले कवच जैसे कई सीरियल शामिल हैं. इनमें डायन से लेकर पिशाच तक को दिखाया जाता है. यहां काल्पनिक कहानियों को इस तरह से आकर्षक बनाकर दिखाया जाता है कि बच्चें और कई बार तो महिलाएं भी उसे सच मान लेते हैं.

लोगों को पता है कि क्या सही है और क्या गलत : संगीता

दिव्य दृष्टि सीरियल में पिशाचिनी का किरदार निभा रही संगीता घोष कहती हैं कि सुपरनेचुरल शोज करने में इतना हंगामा क्यों ऐसा तो नहीं है कि इस को करने के बाद एक्ट्रेस के तौर पर मेरा स्तर गिर जायेगा. मुझे उसके बाद एक्टिंग ही नहीं आयेगी ऐसा तो नहीं था. एक्टर के तौर पर हमें अलग अलग भूमिकाएं करनी चाहिए. लोगों को ऐसे शोज पसंद आ रहे हैं. मैं खुद इस तरह के थ्रिलर शोज पसंद करती हूं. फैंटेंसी और सुपरनेचुरल फिल्में ये सब मुझे पसंद है. जब देखना पसंद है तो करना क्यों नहीं. शो की पैकेजिंग मुझे पसंद है. मेरा रोल बहुत ही डायनामिक है. बहुत ही शेड्स है ऐसा किरदार टीवी पर मिलना मुश्किल है. अच्छी बहु या सकारात्मक किरदार में गिनकर चार एक्सप्रेशन होते हैं. वैसे ये आज का ट्रेंड नहीं है. चंद्रकांता, सिंहासन बत्तीसी, विक्रम बेताल, अलीफ लैला हमेशा से रहे हैं. ये सिर्फ एंटरटेंमेंट का जरिया है. मुझे नहीं लगता कि कोई भी सीरियल या शोज ये कहता है कि हम जो दिखा रहे हैं वो जिंदगी जीने का फलसफा है. आपको ऐसा रहना चाहिए. हर शो में अच्छाइ और सच्चाई की बात होती है. ये सब लोक कथाएं ही तो है. इतना ज्यादा सोचना नहीं चाहिए. रिग्रेसिव तब है जब आप दिखा रहे हो कि औरतों को पीट रहे हैं. औरतों और बच्चों के साथ ज्यादती कर रहे हो. ये सब देश को पीछे धकेलता है. अगर आप बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं. बुढ़े लोगों के साथ गलत व्यवहार करते हैं. वो रिग्रेसिव है. वैसे टीवी पर लोगों को सही गलत सिखाने की जिम्मेदारी नहीं है लोग इतने समझदार हैं कि उन्हें पता है कि क्या सही है क्या गलत.

लोक कहानियों को दिखाना दकियानूसी कैसे: एकता कपूर

जिस दिन दर्शक देखना बंद कर देंगे मैं बनाना बंद कर दूंगी.लोग सिर्फ बोलते हैं कि सुपरनेचुरल शोज से हम दकियानूसी सोच को बढ़ावा दे रहे लेकिन वो देखना वही शो चाहते हैं. सीरियल चल रहा है मतलब साफ है उसे लोग देखते ही हैं. मैं हमेशा ये बात कहती आयी हूं फिर से यही कहूंगी कि टेलीविजन मनोरंजन का ऐसा माध्यम है जहां लोग रियलिटी नहीं देखना चाहते बल्कि अपनी रियलिटी से दूर भागना चाहते हैं. सुपरनेचुरल शोज से इतनी दिक्कत है तो विदेशी शो गेम ऑफ थ्रोन्स सुबह छह बजे उठकर इंडियन लोग क्यों देखते हैं. अगर वेस्ट में लड़के लड़कियां शोज के दौरान ड्रैगन या ड्रैकुला बनते हैं तो आपको परेशानी नहीं होती है. हमारी यहां नागिनें बनती हैं तो क्या परेशानी है. वेस्ट की वीएफएक्स की आप तारीफ करते हैं. यहां हमारे पास इतना बजट नहीं है लेकिन अगर हम अपनी दंत या लोक कहानियां दिखा रहे तो दकियानूसी कैसे हो जाते हैं. हमारे यहां तो लोक कहानियां विदेशों से ज्यादा हैं.

आज भी समाज में जागरूकता की कमी है. यही वजह है कि इस तरह के सीरियल बड़ी आसानी से हमारी दिनचर्या में शामिल हो रहे हैं. सरकार की ओर से इस तरह के चीजों को रोकने और समाज में अंधविश्वास फैलने से रोकने के लिए सेंसर बोर्ड का गठन किया है, लेकिन अफसोस वे इसे रोक नहीं पा रहे हैं. ऐसे में वे ही कही न कही इस अंधविश्वास को फैलाने में अपना योगदान दे रहे हैं. जबकि आज ऐसे सीरियलों की जरूरत है जो रूढ़ीवादी भ्रांतियों को तोड़े और लोगों के सामने किसी भी चीज का वैज्ञानिक विश्लेषण पेश करें.
– डीएम दिवाकर, समाजशास्त्री

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