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Home Entertainment RIP Kader Khan: इंजीनियरिंग से अभिनय और फिर मुम्बई की चकाचौंध से दूर टोरंटो में गुम हुआ सितारा

RIP Kader Khan: इंजीनियरिंग से अभिनय और फिर मुम्बई की चकाचौंध से दूर टोरंटो में गुम हुआ सितारा

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RIP Kader Khan: इंजीनियरिंग से अभिनय और फिर मुम्बई की चकाचौंध से दूर टोरंटो में गुम हुआ सितारा

नयी दिल्ली : चरित्र कलाकार कादर खान ने बॉलीवुड में हर तरह की भूमिका निभा कर लोगों का दिल जीता. खान आॅन स्क्रीन और आॅफ स्क्रीन दोनों में महत्वपूर्ण थे, जहां एक तरफ उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, वहीं 250 से अधिक फिल्मों को अपनी लेखनी से जीवंत बनाया था.

इंजीनियर, पटकथा लेखक, अभिनेता, संवाद लेखक ने नववर्ष की सुबह देखने से पहले टोरंटो में दुनिया को अलविदा कह कर चले गये. काबुल में जन्मे खान बॉलीवुड में पारी का आगाज करने से पहले सिविल इंजीनियरिंग विभाग में प्राध्यापक थे.

अभिनेता दिलीप कुमार ने कॉलेज के वार्षिक समारोह में एक नाटक के दौरान उनकी प्रतिभा को पहचाना और बस यहीं से उन्होंने बॉलीवुड की ओर कूच किया. यह बड़े व्यावसायिक फिल्मों और 1960 के दशक के रोमांटिक नायकों का दौर था.

1970 के दशक की शुरुआत में पहले से ही अमिताभ बच्चन के ‘एंग्री यंगमैन’ के लिए जमीन तैयार थी. अभिनेता बनने से पहले कादर खान ने फिल्मों में अपनी शुरुआत एक लेखक के तौर पर की थी.

उन्होंने रणधीर कपूर और जया बच्चन की फिल्म ‘जवानी दीवानी’ के लिए संवाद लिखे थे. खान ने राजेश खन्ना के साथ फिल्म ‘दाग’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी. फिल्म ‘अमर अकबर एन्थोनी’ और ‘शोला और शबनम’ में उनकी लेखनी को काफी लोकप्रियता मिली.

‘शराबी’, ‘लावारिस’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘नसीब’ और ‘अग्निपथ’ जैसी फिल्मों में उन्होंने बिग बी के लिए कई मशहूर संवाद लिखे और उनके करियर को आगे बढ़ाने में उनकी मदद की. जिससे इस मेगास्टार को 1991 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया.

बड़े पर्दे पर गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी भी काफी मशहूर रही. दोनों ने ‘राजा बाबू’, ‘कुली नंबर 1’, ‘साजन चले ससुराल’, ‘हीरो नंबर 1’ और ‘दुल्हे राजा’ जैसी कई हिट फिल्में दी. इसके साथ ही उन्होंने विभिन्न तरह की फिल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखाया.

कॉमेडी में हाथ आजमाने से पहले उन्होंने फिल्म ‘दिल दीवाना’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘मिस्टर नटवरलाल’ में गंभीर किरदार अदा किये. ‘मेरी आवाज सुनो’ (1982) और ‘अंगार’ (1993) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक की श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला.

फिल्म ‘बाप नम्बरी बेटा दस नम्बरी’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन के पुरस्कार से भी नवाजा गया. कादर खान आखिरी बार 2017 की फिल्म ‘मस्ती नहीं सस्ती’ में नजर आये, जो कब आयी और चली गयी… लोगों को पता ही नहीं चला.

इससे पहले वह अर्जुन कपूर की फिल्म ‘तेवर’ (2015) में नजर आये थे. उन्होंने फिल्मी दुनिया से आधिकारिक तौर पर कभी संन्यास नहीं लिया लेकिन बीते कुछ साल में वह भीड़ में कहीं खो जरूर गये थे.

खान ने 2015 में फिल्म ‘हो गया दिमाग का दही’ के ट्रेलर लॉन्च के दौरान कहा था, एक लेखक के तौर पर मुझे लगता है कि मुझे वापसी करनी चाहिए. मैं पुरानी जुबान (भाषा) वापस लाने की पूरी कोशिश करूंगा और लोगों का जरूर उस ‘जुबान’ में बात करना पसंद आएगा.

अपनी जिंदगी के आखिरी कुछ वर्षों में कादर खान मुम्बई की चकाचौंध से दूर हो गये और अपने बेटे के साथ टोरंटो चले गये. वहीं एक अस्पताल में 31 दिसम्बर शाम करीब छह बजे उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली. खान का अंतिम संस्कार भी वहीं (कनाडा में) किया जाएगा.

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