संजीव सिंह की रिपोर्ट-
Jharkhand University Employee Tribunal: झारखंड में ट्रिब्यूनल बनाने का मकसद यह है कि छोटी-बड़ी सेवा संबंधी शिकायतों के लिए कर्मचारियों को सीधे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का रुख न करना पड़े. पहले कर्मचारी शिकायत निवारण समिति मामले की सुनवाई करेगी और उसके फैसले से असंतुष्ट होने पर कर्मचारी ट्रिब्यूनल (Tribunal) में अपील कर सकेंगे.
What is Tribunal: क्या होता है ट्रिब्यूनल?
ट्रिब्यूनल (Tribunal) को आसान भाषा में विशेष अदालत (Special Court) कहा जा सकता है. आमतौर पर जब कोई विवाद होता है, तो नॉर्मल कोर्ट (जैसे जिला कोर्ट या हाईकोर्ट) जाते हैं. इस नॉर्मल कोर्ट में पहले से ही लाखों केस पेडिंग होते हैं, जिसकी वजह से फैसला आने में सालों लग जाते हैं. इसी समस्या को सुलझाने के लिए सरकार ने ट्रिब्यूनल कोर्ट बनाए हैं.
भारत में कुछ ट्रिब्यूनल कोर्ट एक्टिव हैं. इनमें CAT यानी सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल सबसे ज्यादा मशहूर है. यह सरकारी कर्मचारियों की नौकरी, सैलरी या ट्रांसफर से जुड़े विवादों को सुलझाता है. इसी तरह से NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) कपनियों के आपसी विवादों या उनके दिवालिया होने से जुड़े मामलों को देखता है.
झारखंड में ट्रिब्यूनल में कौन-कौन होंगे सदस्य?
इस ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या ऐसे व्यक्ति करेंगे जो हाईकोर्ट के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखते हों. इसके अलावा इसमें कानूनी मामलों का लंबा अनुभव रखने वाले अधिवक्ता, झारखंड वित्तीय सेवा के संयुक्त सचिव स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारी और प्रशासनिक मामलों का अनुभव रखने वाले अधिकारी सदस्य बनाए जाएंगे.
जरूरत पड़ने पर अध्यक्ष किसी विशेषज्ञ को भी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल कर सकेंगे. किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर को सदस्य सचिव बनाया जाएगा. इन सभी की नियुक्ति तीन साल के लिए होगी और उन्हें वेतन व भत्ते भी दिए जाएंगे. ट्रिब्यूनल की बैठक के लिए कम से कम दो सदस्यों की मौजूदगी जरूरी होगी.
ट्रिब्यूनल में किन मामलों में कर सकेंगे अपील?
अगर किसी शिक्षक या कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया जाता है, सेवा समाप्त कर दी जाती है, जबरन रिटायर किया जाता है या उसका पद घटा दिया जाता है, तो वह ट्रिब्यूनल में अपील कर सकेगा. हालांकि जो मामले पहले से किसी कोर्ट या दूसरे न्यायाधिकरण में लंबित हैं, उनकी सुनवाई इस ट्रिब्यूनल में नहीं होगी.
झारखंड में सरकारी विश्वविद्यालयों के 650 मामले कोर्ट में पेंडिंग
फिलहाल झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों से जुड़े करीब 650 मामले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित बताए जा रहे हैं. इनमें अधिकतर विवाद वेतन निर्धारण, नियुक्ति, प्रोन्नति और सेवा शर्तों से जुड़े हैं. इन मामलों की संख्या कम करने के लिए पहले लोक अदालत का भी सहारा लिया गया था.
राज्य सरकार ने सभी विश्वविद्यालयों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति भी की है ताकि लंबित मामलों की नियमित निगरानी हो सके. अब ट्रिब्यूनल बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि नए विवाद जल्दी सुलझेंगे और अदालतों पर भी बोझ कम होगा.
आदेश नहीं मानने पर लगेगा जुर्माना
अगर कोई विश्वविद्यालय ट्रिब्यूनल के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ आर्थिक कार्रवाई भी की जाएगी. पहली बार आदेश की अनदेखी करने पर विश्वविद्यालय पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. सामान्य स्थिति में यह जुर्माना 10 हजार रुपये से कम नहीं होगा. अगर दूसरी बार भी निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो जुर्माना बढ़ाकर पांच लाख रुपये तक किया जा सकता है.
ऐसी स्थिति में न्यूनतम जुर्माना 50 हजार रुपये रहेगा, जब तक कि ट्रिब्यूनल अपने फैसले में कोई विशेष कारण दर्ज न करे. सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सेवा संबंधी विवादों का समाधान पहले से ज्यादा तेज और प्रभावी तरीके से हो सकेगा.
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