पति या बच्चे न हों तो महिला की कमाई पर किसका हक? जानें ये नियम 

Women Property Inheritance Rights: महिला की बिना वसीयत मौत पर उसकी कमाई संपत्ति किसे मिलती है? जानिए क्यों पति या बच्चे न होने पर माता-पिता से पहले ससुराल का हक होता है.

By Soumya Shahdeo | May 23, 2026 3:04 PM

Women Property Inheritance Rights: आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं. नौकरी, बिजनेस, इन्वेस्टमेंट और प्रॉपर्टी के जरिए वे अपनी खुद की संपत्ति (Wealth) खड़ी कर रही हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी शादीशुदा हिंदू महिला ने वसीयत (Will) नहीं बनाई है और उसकी मौत हो जाती है, तो उसकी कमाई हुई संपत्ति किसे मिलेगी?

ज्यादातर लोगों को लगता है कि पति या बच्चों के न होने पर यह संपत्ति महिला के माता-पिता को मिलेगी, लेकिन कानूनन ऐसा नहीं होता. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) के नियम काफी पेचीदा हैं, जिन्हें समझना हर महिला के लिए बेहद जरूरी है.

पति या बच्चे न हों, तो संपत्ति पर किसका हक होगा?

अगर किसी शादीशुदा हिंदू महिला की मौत बिना वसीयत बनाए (Intestate) हो जाती है और उसका पति या कोई बच्चा भी जीवित नहीं है, तो उसकी संपत्ति किसे मिलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति आई कहां से थी:

  • खुद की कमाई प्रॉपर्टी (Self-Acquired): कानून के सेक्शन 15(1) के मुताबिक, पहली कतार में पति और बच्चे होते हैं. अगर वे नहीं हैं, तो संपत्ति सीधे पति के वारिसों (In-laws/ससुराल पक्ष) के पास चली जाएगी. महिला के अपने माता-पिता का नंबर इसके बाद (तीसरी कतार में) आता है.
  • मायके से मिली प्रॉपर्टी: अगर महिला को कोई संपत्ति अपने माता-पिता से विरासत में मिली थी, तो सेक्शन 15(2)(a) के तहत वह वापस पिता के कानूनी वारिसों को मिल जाती है. इसमें ससुराल पक्ष का हक नहीं होता.
  • ससुराल से मिली प्रॉपर्टी: अगर संपत्ति पति या ससुर से मिली थी, तो सेक्शन 15(2)(b) के अनुसार वह पति के वारिसों को ही वापस जाएगी.

यानी एक ही महिला की अलग-अलग संपत्तियां उसके सोर्स के आधार पर एक साथ तीन अलग-अलग दिशाओं में जा सकती हैं.

पुरुषों और महिलाओं के लिए कानून अलग क्यों है?

इस कानून में एक बड़ा अंतर (Asymmetry) है. जब किसी हिंदू पुरुष की बिना वसीयत मौत होती है, तो उसकी मां को ‘क्लास-1’ का वारिस माना जाता है. यानी पत्नी और बच्चों के साथ मां को भी तुरंत बराबर का हिस्सा मिलता है. इसके उलट, महिला के मामले में उसके खुद के माता-पिता को तीसरी कतार में रखा गया है. उन्हें हक तभी मिलेगा जब ससुराल पक्ष में कोई भी वारिस न बचा हो. इस गैर-बराबरी पर लगातार सवाल उठ रहे हैं और यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने भी है.

वसीयत (Will) बनाना महिलाओं के लिए क्यों जरूरी है?

कानून के इसी उलझाव के कारण कामकाजी, सिंगल, विधवा या तलाकशुदा महिलाओं के लिए वसीयत बनाना सबसे सुरक्षित रास्ता है. वसीयत आपको यह ताकत देती है कि आपकी संपत्ति आपकी मर्जी से आपके बच्चों, बुजुर्ग माता-पिता या किसी भी निर्भर व्यक्ति को मिले, न कि कानूनी डिफॉल्ट के भरोसे रहे.

वसीयत न होने पर परिवार को क्या मुश्किलें आती हैं?

अगर बिना वसीयत के संपत्ति छोड़ दी जाए, तो पीछे छूटे परिवार को कई कानूनी और मानसिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है:

  • पारिवारिक विवाद: मायके और ससुराल पक्ष के बीच संपत्ति को लेकर खींचतान और मुकदमेबाजी शुरू हो जाती है.
  • अकाउंट फ्रीज होना: बैंक खाते, शेयर, इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट के पैसे तब तक ब्लॉक रहते हैं जब तक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) न मिल जाए.
  • माता-पिता की लाचारी: जो बुजुर्ग माता-पिता अपनी बेटी पर आर्थिक रूप से निर्भर थे, वे कानूनी पेचों के कारण अचानक बेसहारा हो सकते हैं.
  • ज्वैलरी और बिजनेस पर झगड़े: गहनों, डिजिटल एसेट्स और फैमिली बिजनेस के मालिकाना हक को लेकर भाई-बहनों या रिश्तेदारों में दूरियां आ जाती हैं.

अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने और अपनों को विवादों से बचाने का इकलौता साफ तरीका यही है कि समय रहते एक स्पष्ट वसीयत जरूर लिख ली जाए.

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