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SCO Meeting: आईएमएफ और विश्व बैंक को चुनौती, शी जिनपिंग का नए विकास बैंक पर जोर

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SCO Meeting: आईएमएफ और विश्व बैंक को चुनौती, शी जिनपिंग का नए विकास बैंक पर जोर
एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (बाएं), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बीच में) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग.

SCO Meeting: शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 25वें शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सोमवार को वैश्विक वित्तीय परिदृश्य को नया आकार देने वाला बड़ा सुझाव दिया. उन्होंने एससीओ सदस्य देशों से आग्रह किया है कि वे जल्द से जल्द एक विकास बैंक (डेवलपमेंट) की स्थापना करें. यह कदम न केवल एससीओ देशों के आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे पारंपरिक वित्तीय संस्थानों के विकल्प के रूप में उभरेगा.

शी जिनपिंग का प्रस्ताव

शी जिनपिंग ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि एससीओ अब दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन बन चुका है, जिसमें 26 देश प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं. वर्तमान में संगठन लगभग 30,000 अरब अमेरिकी डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसे में संगठन के पास न केवल वैश्विक प्रभाव है बल्कि अपने सदस्यों के लिए वैकल्पिक वित्तीय ढांचा तैयार करने की क्षमता भी है.

चीन का मकसद और पिछला अनुभव

चीन पहले भी वित्तीय संस्थानों की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभा चुका है. इनमें ब्रिक्स का न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) और एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) शामिल हैं. इन दोनों संस्थानों को शुरुआत में आईएमएफ, विश्व बैंक और एडीबी (एशियन डेवलपमेंट बैंक) का प्रतिस्पर्धी माना गया था. लेकिन समय के साथ ये सह-वित्तपोषण (को-फाइनेंसिंग) मॉडल पर पारंपरिक बैंकों के साथ मिलकर काम करने लगे. शी जिनपिंग अब इसी अनुभव का उपयोग कर एससीओ देशों के लिए एक नई वित्तीय संस्था खड़ी करना चाहते हैं.

भारत और रूस की भूमिका

एससीओ में भारत दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है. ऐसे में नए बैंक की स्थापना पर भारत की भूमिका बेहद अहम होगी. भारत ने अब तक वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज बुलंद की है और वित्तीय सुधारों की पैरवी की है. भारत और रूस दोनों ही एससीओ के संस्थापक सदस्य हैं. शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मौजूद रहे. यदि यह बैंक बनता है, तो भारत और रूस इसकी नीतियों व दिशा तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं.

सदस्यता और संगठन की ताकत

एससीओ की स्थापना 2001 में शंघाई में हुई थी. इसके सदस्य देश रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, चीन, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलारूस हैं. इसके अलावा, अफगानिस्तान और मंगोलिया पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल हैं, जबकि 14 देश संवाद भागीदार के रूप में जुड़े हुए हैं. शी जिनपिंग ने कहा कि एससीओ का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और इसे अपने सदस्य देशों के विशाल बाजार और आर्थिक पूरकता का लाभ उठाना चाहिए.

नए बैंक के संभावित लाभ और असर

यदि एससीओ बैंक की स्थापना होती है तो इससे कई बड़े फायदे होंगे.

  • विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहयोग: ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और परिवहन जैसी परियोजनाओं को गति मिलेगी।
  • डिजिटल और हरित उद्योग को प्रोत्साहन: सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप हरित ऊर्जा और डिजिटल इकॉनमी को बढ़ावा मिलेगा.
  • पश्चिमी देशों के वर्चस्व को चुनौती: आईएमएफ और विश्व बैंक पर पश्चिमी देशों का प्रभाव लंबे समय से देखा जाता है. एससीओ बैंक इस असंतुलन को कम कर सकता है.
  • क्षेत्रीय सहयोग में मजबूती: वित्तीय स्वतंत्रता और क्षेत्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा.

विकसित होंगे सहयोग के नए क्षेत्र

शी जिनपिंग ने विशेष रूप से कहा कि सदस्य देशों को ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, विज्ञान-तकनीक नवाचार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) में संयुक्त परियोजनाओं पर जोर देना चाहिए. इन क्षेत्रों में एससीओ बैंक निवेश को वित्तीय मजबूती दे सकता है.

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एससीओ का लगातार बढ़ रहा है दायरा

शंघाई सहयोग संगठन (एसीओ) का दायरा और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. ऐसे समय में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का विकास बैंक बनाने का प्रस्ताव सदस्य देशों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है. यह न केवल अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में संतुलन लाने का प्रयास होगा, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों को अपने विकास मॉडल को आगे बढ़ाने का अवसर भी देगा.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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