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धौंस-धमकी से नहीं डरता भारत, ट्रंप को पीएम मोदी ने दिया कड़ा संदेश

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धौंस-धमकी से नहीं डरता भारत, ट्रंप को पीएम मोदी ने दिया कड़ा संदेश
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (बाएं), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बीच में) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (दाएं)

PM Modi Trump Message: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल का पदभार ग्रहण करते ही भारत को टैरिफ के नाम धौंस-धमकी देना शुरू कर दिया. उन्होंने न केवल धौंस-धमकी दिया, बल्कि भारत पर 50% तक भारी टैरिफ भी लाद दिया. उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि इससे भारत डर जाएगा. लेकिन भारत कभी ट्रंप की धौंस-धमकी के आगे नहीं झुका. अभी सितंबर महीने की शुरुआत में ही चीन के तियानजिन शहर में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को कड़ा संदेश भेजकर भारत की मंशा को इजहार कर दिया. इस बात का बखान अमेरिका की विख्यात अंग्रेजी की ‘टाइम’ पत्रिका ने भी बखान किया है.

एससीओ सम्मेलन से भारत का संकेत

टाइम पत्रिका ने ‘हाऊ मोदी इज सेंडिंग ट्रंप ए मैसेज’ शीर्षक से प्रकाशित एक रिपोर्ट में लिखा है कि सितंबर 2025 की शुरुआत में चीन के तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन ने भारत की कूटनीतिक मंशा को स्पष्ट कर दिया. प्रधानमंत्री मोदी रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ खुलकर बातचीत करते, मुस्कुराते और मित्रवत नजर आए. यह दृश्य केवल औपचारिकता नहीं था, बल्कि संदेश था कि भारत अमेरिकी दबाव से विचलित नहीं होगा. वाशिंगटन ने इसे गंभीरता से लिया, क्योंकि पिछले दो दशकों में भारत की विदेश नीति अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अधिक निकट हुई थी. ऐसे में एससीओ मंच पर रूस और चीन के साथ भारत की गर्मजोशी ट्रंप प्रशासन के लिए एक चेतावनी थी.

अमेरिका के साथ संबंधों का उतार-चढ़ाव

रिपोर्ट में आगे लिखा गया है कि भारत ने बीते वर्षों में अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक और रक्षा संबंध बनाए. 2007 में क्वाड गठबंधन में शामिल होना और नियमित सैन्य अभ्यास करना इसी का हिस्सा था. लेकिन, जून 2025 में मोदी और ट्रंप के बीच तनावपूर्ण फोन वार्ता और फिर 50% टैरिफ ने रिश्तों में खटास ला दी. ट्रंप का यह कदम अमेरिका की व्यापारिक आक्रामकता का हिस्सा था, लेकिन भारत के लिए यह अनुचित था, क्योंकि यूरोप और चीन भी रूसी तेल खरीदते रहे. फिर भी, केवल भारत को दंडित किया गया. यही कारण था कि भारत ने इसे दबाव मानने के बजाय अपनी संप्रभुता पर हमले के रूप में देखा.

तीन विकल्पों के बीच भारत का निर्णय

रिपोर्ट कहती है कि ट्रंप की धमकी और टैरिफ नीति के सामने भारत के पास तीन रास्ते थे. पहला, अमेरिका के दबाव में आकर नीति बदलना, जैसा जापान और यूरोप ने किया. दूसरा, कुछ न करना और परिणाम भुगतना और तीसरा, प्रतीकात्मक और ठोस कदमों का संतुलित मिश्रण अपनाना. मोदी सरकार ने तीसरा विकल्प चुना. भारत ने तुरंत अमेरिकी दबाव में नहीं झुकते हुए रूस और चीन के साथ तालमेल का संकेत दिया, लेकिन साथ ही अमेरिका से रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं किए. यह रणनीति भारत की बहुध्रुवीय नीति का हिस्सा है, जो किसी एक खेमे में बंधने के बजाय सभी शक्तियों के साथ संतुलन बनाने पर आधारित है.

भारत-चीन-रूस समीकरण की हकीकत

टाइम ने लिखा है कि तियानजिन शिखर सम्मेलन के दृश्य भले ही भारत-चीन-रूस की नजदीकी दिखाते हों, लेकिन हकीकत अलग है. एससीओ एक चीन-प्रधान मंच है और भारत इसकी सीमाओं को अच्छी तरह समझता है. भारत और चीन के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद है, जो 2020-21 में भी हिंसक झड़पों में बदल चुका था. ऐसे में स्थायी सामंजस्य की संभावना कम है. भारत जानता है कि एससीओ का मंच रणनीतिक रूप से सीमित है और इसे विदेश नीति का केंद्रीय आधार नहीं बनाया जा सकता. रूस के साथ भारत के संबंध भी जटिल हैं. हालांकि, भारत ने अपनी रक्षा निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया है, फिर भी वह रूसी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है. इस स्थिति में अमेरिकी दबाव भारत को रूस से दूर नहीं कर सकता.

ट्रंप प्रशासन के लिए भारत का स्पष्ट संदेश

भारत का मकसद न तो अमेरिका-विरोधी गठबंधन बनाना था और न ही चीन-रूस के साथ स्थायी साझेदारी स्थापित करना, बल्कि यह एक संकेत था कि अमेरिका की धौंस-धमकी स्वीकार्य नहीं होगी. भारत ने यह स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति बहुध्रुवीय है और वह सभी वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाकर चलेगा. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की प्राथमिकता अभी भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना है, लेकिन यह सहयोग किसी भी हालत में उसकी संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय क्षमता की कीमत पर नहीं होगा.

अमेरिका-भारत संबंधों पर दीर्घकालिक प्रभाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप की नीतियों ने भारतीय रणनीतिक अभिजात वर्ग के भीतर अमेरिका के प्रति संदेह को फिर से जीवित कर दिया. यह धारणा मजबूत हुई कि अमेरिका भरोसेमंद साझेदार नहीं है और कभी भी अपने हित में भारत पर दबाव डाल सकता है. हालांकि, यह असंतोष स्थायी नहीं होगा. भारतीय विदेश नीति लंबे समय से “बहु-संरेखण” यानी सभी शक्तियों से अच्छे संबंध बनाए रखने की रणनीति पर आधारित रही है. ट्रंप का आक्रामक रुख इस रणनीति को और मजबूत ही करता है.

भारत की रणनीति और भविष्य की राह

टाइम पत्रिका लिखती है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन की बढ़ती शक्ति है. इसे संतुलित करने के लिए भारत को अमेरिका और पश्चिम के साथ सहयोग करना होगा, लेकिन साथ ही रूस के साथ रक्षा संबंध बनाए रखना भी जरूरी है. भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है और दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया तथा यूरोप से जुड़ाव बढ़ाना चाहता है. यह सब दर्शाता है कि भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर नहीं रहना चाहता. ट्रंप की नीतियों से उपजी यह अड़चन अस्थायी है. दीर्घकालिक रूप से भारत का रणनीतिक मार्ग वही रहेगा, सभी प्रमुख शक्तियों से संतुलित संबंध रखना और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करना.

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भारत की दृढ़ विदेश नीति

डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ और दबाव ने यह दिखा दिया कि नई दिल्ली अब किसी भी वैश्विक शक्ति के सामने झुकने को तैयार नहीं है. एससीओ सम्मेलन में मोदी की सक्रिय भूमिका और चीन-रूस के साथ तालमेल ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और अमेरिकी दबाव उसे दिशा नहीं देगा. टाइम पत्रिका ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि भारत अब वैश्विक मंच पर निडर होकर अपने हितों की रक्षा कर रहा है. अंततः, भारत की रणनीति बहुध्रुवीय, संतुलित और आत्मनिर्भर विदेश नीति पर टिकी रहेगी, जिसे कोई भी धौंस-धमकी बदल नहीं सकती.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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