मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज: कैसे सामुदायिक संरक्षण मॉडल दुनिया के लिए नजीर बन रहा है ?

Meghalay Community : मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज सामुदायिक संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान की अनूठी मिसाल हैं. खासी और जयंतिया समुदाय सदियों से जंगलों, नदियों और जैव विविधता की रक्षा कर रहे हैं. सरकार और समुदाय की साझेदारी से यह सांस्कृतिक परिदृश्य अब यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

By Abhishek Pandey | July 2, 2026 5:08 PM

Meghalay Community : हिमालय की गोद में बसा मेघालय अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है. लेकिन बदलते जलवायु चक्र और बढ़ते पर्यटन के बीच, यहां की पारिस्थितिकी (Ecology) को बचाने की चुनौती बढ़ गई है. मेघालय के ‘लिविंग रूट ब्रिज’ और वहां के सामुदायिक संरक्षण मॉडल ने साबित किया है कि प्रकृति के साथ विकास का संतुलन कैसे बनाया जा सकता है. केंद्र सरकार की मदद से मेघालय अब इसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जहां विकास केवल कंक्रीट के पुलों तक सीमित नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी पर केंद्रित है.

अनूठा उदाहरण बना सामुदायिक संरक्षण

मेघालय के दक्षिणी खासी और जयंतिया पहाड़ियों में स्थित जिंगकिएंग जरी और ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य आज दुनिया के सामने सामुदायिक संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण बनकर उभरा है. यहां के खासी और जयंतिया समुदायों ने पीढ़ियों से जंगलों, नदियों, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा किसी कानूनी बाध्यता से नहीं, बल्कि एक गहरे जीवन-दर्शन के आधार पर की है. उनका विश्वास है कि मनुष्य धरती का मालिक नहीं, बल्कि उसका संरक्षक है.

खासी संस्कृति के अनुसार धरती माता एक जीवंत इकाई है, जो सभी प्रकार के जीवन का पोषण करती है. इसलिए उसका सम्मान करना, उसकी देखभाल करना और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर स्थिति में छोड़ना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी मानी जाती है. यही दर्शन आज मेघालय के संरक्षण मॉडल की सबसे बड़ी ताकत बन गया है.

46 सहकारी समितियां संभाल रहीं जिम्मेदारी

दक्षिणी खासी और जयंतिया पहाड़ियों के 74 से अधिक गांवों का प्रतिनिधित्व करने वाली 46 सामुदायिक सहकारी समितियां ‘सिरवेट उ बरीम मारियांग जिंगकिएंग जरी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड’ के तहत संगठित हैं. यह संगठन सामूहिक रूप से पूरे जिंगकिएंग जरी / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य की देखरेख करता है. इन समुदायों का मानना है कि प्राकृतिक धरोहरों का संरक्षण तभी संभव है, जब स्थानीय लोग स्वयं उसकी जिम्मेदारी निभाएं. इसी सोच के साथ गांव स्तर पर निर्णय लिए जाते हैं और पारंपरिक शासन व्यवस्था के माध्यम से संरक्षण कार्यों को आगे बढ़ाया जाता है.

  • पारंपरिक वन प्रबंधन: मेघालय के कई क्षेत्रों में ‘वन पंचायतें’ और स्थानीय समितियां सदियों से वनों की रक्षा कर रही हैं.
  • जैव विविधता का संरक्षण: स्थानीय समुदायों ने ‘पवित्र उपवनों’ (Sacred Groves) के माध्यम से दुर्लभ औषधीय पौधों और हिमालयी जीव-जंतुओं को संरक्षित किया है.
  • सतत आजीविका: अब मेघालय में पर्यटन को ‘होमस्टे’ और ‘इको-टूरिज्म’ से जोड़ा जा रहा है, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार के लिए जंगल काटने की जरूरत न पड़े.
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लिविंग रूट ब्रिज: प्रकृति और मानव सहयोग की मिसाल

इस सांस्कृतिक परिदृश्य की सबसे बड़ी पहचान लिविंग रूट ब्रिज यानी जीवित जड़ों से बने पुल हैं. ये पुल फीकस इलास्टिका (रबर) के पेड़ों की हवाई जड़ों को वर्षों तक सावधानीपूर्वक नदियों और जलधाराओं के ऊपर मार्गदर्शित करके तैयार किए जाते हैं.

इन पुलों को पूरी तरह विकसित होने में कई दशक लग जाते हैं. खास बात यह है कि समय बीतने के साथ ये कमजोर नहीं होते, बल्कि और अधिक मजबूत होते जाते हैं. इनका अस्तित्व निरंतर सामुदायिक देखभाल पर निर्भर करता है. यही कारण है कि इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षण और सतत विकास का जीवंत प्रतीक माना जाता है.

अचानक चर्चा में कैसे आया मेघालय का लिविंग रूट्स

लिविंग रूट ब्रिजों पर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान तब आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में उनका उल्लेख किया। उन्होंने इन्हें इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण बताया कि कैसे स्वदेशी ज्ञान वर्तमान जलवायु संकट के लिए स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है। यह मान्यता एक व्यापक राष्ट्रीय चर्चा को और मजबूत करती है – कि समुदाय भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के सक्षम संरक्षक हैं, और स्थायी संरक्षण परिणाम तभी प्राप्त होते हैं जब सरकारें उनके साथ समान भागीदार के रूप में काम करती हैं।

मेघालय में पर्यटन को बढ़ावा दे रहे नेचर होम्स

सिरवेत ऊ बारिम मरिआंग जिंगकिएंग ज्री कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड और एमबीडीए की साझेदारी से समुदायों ने 26 ईंग मरिआंग (नेचर होम्स) और श्लेम जिंगतिप को सेंटर फॉर लर्निंग के रूप में स्थापित किया है. ये जीवंत कक्षाएं हैं जहां ज्ञान लगातार सीखा, अपनाया और साझा किया जाता है. महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी से संरक्षण के प्रयास ख्लॉ (जंगल), की वाह (नदियां), की लॉकीनतांग (पवित्र उपवन), की लीनति की सिंगकिएन (पारंपरिक पगडंडियां) और स्थानीय जैव विविधता तक फैले हैं. इन आपस में जुड़े परिदृश्यों में 120 से अधिक लिविंग रूट ब्रिज शामिल हैं. समुदायों ने देशी प्रजातियों के प्रसार के लिए 25 नर्सरियां भी स्थापित की हैं. पारंपरिक वन मार्गों का जीर्णोद्धार किया है. पारिस्थितिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है, ग्राम सहकारी समितियों को मजबूत किया है और संरक्षण व जिम्मेदार विरासत पर्यटन से जुड़ी स्थायी आजीविका को बढ़ावा दिया है.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सरकार के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए एमबीडीए और मेघालय बेसिन प्रबंधन एजेंसी (एमबीएमए) के महाप्रबंधक वानकिट के स्वेर ने कहा, ‘जिंगकिएंग जरी और ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य आज इसलिए खड़ा है, क्योंकि समुदायों ने अनगिनत पीढ़ियों से इसकी देखभाल की है. एमबीडीए की भूमिका सामुदायिक-नेतृत्व वाली पहलों का समर्थन करके इन प्रयासों को मजबूत करने की रही है. हमारी प्रतिबद्धता समुदायों के साथ समान भागीदार के रूप में काम करने की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संरक्षण उन्हीं लोगों द्वारा संचालित होता रहे, जो इस परिदृश्य को सबसे बेहतर जानते हैं और इसकी परवाह करते हैं.’

धरोहर बनने की दिशा में बढ़ रहा है मेघालय मॉडल

इसी साझेदारी के आधार पर अब इस सांस्कृतिक परिदृश्य को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की जा रही है. यदि यह प्रयास सफल होता है तो मेघालय का यह मॉडल न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रकृति-आधारित संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी और सतत विकास का प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है.

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