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टायरों का कब्रिस्तान बन गया खाड़ी का यह समृद्धशाली देश, जानें असली कारण

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टायरों का कब्रिस्तान बन गया खाड़ी का यह समृद्धशाली देश, जानें असली कारण
टायरों का कब्रिस्तान बन गया कुवैत.

Tyre Graveyard: आप कभी क्या इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि समृद्धि का परचम लहराने वाला कोई देश टायरों का कब्रिस्तान बन सकता है? यकीनन इस बात पर आप यकीन नहीं करेंगे. लेकिन यह सच्चाई है. खाड़ी देशों में सबसे अधिक समृद्धशाली कुवैत फिलवक्त टायरों का कब्रिस्तान बन गया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, समृद्ध अर्थव्यवस्था और अकूत तेल भंडार के लिए विख्यात कुवैत हाल के वर्षों में “टायरों का कब्रिस्तान” (Tyre Graveyard) के रूप में भी कुख्यात हो गया. इस देश में लाखों की संख्या में पुराने और बेकार टायर जमा हो चुके हैं, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा टायर डंपिंग ग्राउंड बन गया है. यह समस्या न केवल पर्यावरणीय संकट को पैदा कर रही है, बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बन चुकी है.

कुवैत में टायरों का विशाल भंडार

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुवैत में हर साल लाखों टायरों को बदल दिया जाता है और उनके निस्तारण के लिए कोई प्रभावशाली प्रणाली नहीं है. इस कारण वे रेगिस्तान के तौर पर जमा होते जा रहे हैं. कई रिपोर्टों के अनुसार, कुवैत में लगभग 5 करोड़ से अधिक टायरों का ढेर लगा हुआ है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा टायर डंपिंग स्थल बनाता है. खासकर अल-सुलैबिया (Al-Sulaibiya) और अल-जहर (Al-Jahra) नामक क्षेत्रों में टायरों के विशाल पहाड़ देखे जा सकते हैं.

टायरों का अवैध निस्तारण और प्रदूषण

पुराने टायरों का उचित निस्तारण न होने के कारण उन्हें खुले में छोड़ दिया जाता है, जिससे कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं.

  • टायरों में आग लगने का खतरा: टायर अत्यधिक ज्वलनशील होते हैं. 2012 और 2021 में कुवैत में टायरों के डंपिंग ग्राउंड में भीषण आग लगी थी, जिसमें लाखों टायर जलकर राख हो गए. यह आग कई दिनों तक जलती रही और इससे जहरीला धुआं उठने लगा, जो मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक था.
  • पर्यावरणीय प्रदूषण: टायर जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं और जलवायु परिवर्तन में योगदान करती हैं.
  • मिट्टी और जल प्रदूषण: जब टायर सड़ते हैं, तो वे हानिकारक रसायन छोड़ते हैं, जो मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करते हैं.
  • कीट और मच्छरों का प्रजनन केंद्र: टायरों में पानी जमा हो सकता है, जिससे मच्छरों और अन्य हानिकारक कीटों के पनपने की संभावना बढ़ जाती है. ये बीमारियों के बढ़ाने में सहायक होते हैं।

कुवैत में टायर संकट के पीछे के कारण

  • टायरों के पुनर्चक्रणकी कमी: कुवैत में टायरों के पुनर्चक्रण की कोई व्यापक व्यवस्था नहीं है. कई देशों में पुराने टायरों को रिसाइकिल कर नई सामग्री बनाई जाती है, लेकिन कुवैत में यह प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है.
  • अवैध डंपिंग: सरकार की ओर से टायरों के सही निस्तारण पर सख्ती न होने के कारण कई कंपनियां और व्यक्ति इन्हें रेगिस्तान में फेंक देते हैं.
  • ऑटोमोबाइल उद्योग का विस्तार: कुवैत में प्रति व्यक्ति कारों की संख्या अधिक है, जिससे हर साल बड़ी मात्रा में पुराने टायर निकलते हैं.
  • जलवायु परिस्थितियां: रेगिस्तानी क्षेत्रों में तापमान अधिक होने के कारण टायर जल्दी खराब हो जाते हैं और उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है.

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समाधान और संभावित उपाय

कुवैत सरकार ने हाल ही में इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं.

  • टायर रिसाइक्लिंग प्लांट की स्थापना: 2021 में कुवैत ने देश के सबसे बड़े टायर रीसाइक्लिंग प्लांट की शुरुआत की, जहां पुराने टायरों को रबर टाइल्स, रोड पेवमेंट और फ्यूल में बदला जाता है.
  • कड़े कानून और जुर्माने: अवैध रूप से टायर फेंकने पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है ताकि लोग इसे खुले में न छोड़ें.
  • टायरों के दोबारा इस्तेमाल की पहल: सड़क निर्माण, खेल के मैदानों और फुटपाथों में रबर ग्रैन्यूल्स के रूप में टायरों का दोबारा उपयोग किया जा रहा है.
  • नए टायर लैंडफिल और व्यवस्थित भंडारण प्रणाली: सरकार ने नए सुरक्षित लैंडफिल साइट्स की स्थापना की है, जहां टायरों को सही ढंग से स्टोर किया जाता है ताकि वे आग न पकड़ें.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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