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युद्ध का टेंशन और महंगाई का डर, जानें RBI ने क्यों नहीं बदला ब्याज दर

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युद्ध का टेंशन और महंगाई का डर, जानें RBI ने क्यों नहीं बदला ब्याज दर
आरबीआई अधिकारियों ने पदोन्नति नीति में सुधार के लिए गवर्नर से हस्तक्षेप की मांग की (Photo: ANI)

RBI Monetary Policy 2026: हाल ही में हुई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक के नतीजे सामने आए हैं. गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने साफ कर दिया है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ता युद्ध का तनाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द बन सकता है. इसी अनिश्चितता को देखते हुए आरबीआई ने अपनी मुख्य ब्याज दर (रेपो रेट) को 5.25% पर बरकरार रखा है. 

क्या तेल की कीमतें बिगाड़ देंगी आपके घर का बजट?

मीटिंग में इस बात पर सबसे ज्यादा चिंता जताई गई कि युद्ध के कारण कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें आसमान छू रही हैं. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मिडल ईस्ट पर काफी निर्भर है. पैनल के सदस्य प्रोफेसर राम सिंह ने बताया कि पिछले कुछ हफ्तों में कच्चे तेल के दाम 40% तक बढ़ चुके हैं. अगर तेल महंगा होता है, तो माल ढुलाई महंगी होगी, जिससे फल, सब्जी और अन्य जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ सकती हैं. अनुमान है कि साल 2026-27 में महंगाई की दर 4.6% तक जा सकती है. 

क्या देश की तरक्की की रफ्तार सुस्त पड़ने वाली है?

दुनियाभर में चल रही उथल-पुथल का असर भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ पर भी दिखने लगा है. आरबीआई ने अगले वित्त वर्ष (2026-27) के लिए विकास दर का अनुमान घटाकर 6.9% कर दिया है, जो पिछले साल 7.6% था. इसका बड़ा कारण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों में पैदा हुआ संकट है. इससे न सिर्फ सप्लाई चेन टूटी है, बल्कि भारत के एक्सपोर्ट पर भी बुरा असर पड़ा है. सीधे शब्दों में कहें तो बाहरी रुकावटें भारत की रफ्तार को लगभग 0.60% तक कम कर सकती हैं. 

ब्याज दरों में बदलाव क्यों नहीं किया गया?

आरबीआई ने अपनी नीति को न्यूट्रल रखा है. मेंबर सौगत भट्टाचार्य के अनुसार, इस समय न तो ब्याज दरें बढ़ाना सही है और न ही घटाना. अगर दरें बढ़ाई जाती हैं तो लोन महंगे होंगे और ग्रोथ रुकेगी, और अगर घटाई जाती हैं तो महंगाई बेकाबू हो सकती है. डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता और कार्यकारी निदेशक इंद्रनील भट्टाचार्य का मानना है कि फिलहाल महंगाई सप्लाई की कमी की वजह से है, जिसे केवल ब्याज दरें बढ़ाकर कंट्रोल नहीं किया जा सकता. इसलिए, वेट एण्ड वॉच  की नीति अपनाना ही समझदारी है. 

रुपये की गिरती कीमत से क्या होगा नुकसान?

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है, जिससे हमारा करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) यानी व्यापार घाटा बढ़ने का डर है. गवर्नर मल्होत्रा ने चेतावनी दी है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को काबू करना और विकास को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा. फिलहाल, आरबीआई हर बदलाव पर पैनी नजर रखे हुए है ताकि देश की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाया जा सके. 

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