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Home Business देश में प्रदूषण घटाने का नया फॉर्मूला, ग्रीन स्टील बनेगा गेमचेंजर

देश में प्रदूषण घटाने का नया फॉर्मूला, ग्रीन स्टील बनेगा गेमचेंजर

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देश में प्रदूषण घटाने का नया फॉर्मूला, ग्रीन स्टील बनेगा गेमचेंजर

India Green Steel : देश में जब भी कोई नया हाईवे बनता है, मेट्रो की पटरी बिछती है या कोई भव्य सरकारी इमारत खड़ी होती है, तो उसमें लाखों-करोड़ों टन इस्पात (स्टील) का इस्तेमाल होता है. इस समय भारत का सार्वजनिक क्षेत्र (Government Sector) देश का सबसे बड़ा स्टील खरीदार है, जो अकेले हर साल करोड़ों टन स्टील की खपत करता है. लेकिन चिंता की बात यह है कि वर्तमान में इसमें से लगभग कुछ भी ‘हरित’ (Green) नहीं है.

इस विश्व पर्यावरण दिवस पर जिसकी थीम ‘प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए’ है . एक बेहद महत्वपूर्ण अध्ययन रिपोर्ट सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सरकार अपनी स्टील खरीद का एक छोटा सा हिस्सा भी साफ और प्रदूषण-मुक्त स्रोतों से करना शुरू कर दे, तो वह उस इस्पात उद्योग का पूरा नक्शा बदल सकती है जो भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन का 10% से 12% हिस्से के लिए जिम्मेदार है. इसके लिए किसी नई तकनीक की नहीं, बल्कि सिर्फ सरकार के एक ‘खरीद आदेश’ (Procurement Order) की जरूरत है.

क्या होता है ‘ग्रीन स्टील’ और भारत के लिए यह क्यों जरूरी है?

पारंपरिक रूप से स्टील बनाने के लिए कोयले की बड़ी-बड़ी भट्टियों में लौह अयस्क (Iron Ore) को पिघलाया जाता है. इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) गैस निकलती है.

  • उत्सर्जन का गणित: इस्पात मंत्रालय के मुताबिक, भारत में हर 1 टन स्टील बनाने पर 2.54 टन $CO_2$ उत्सर्जित होती है, जो वैश्विक औसत (1.91 टन) से काफी ज्यादा है. ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के अनुसार, साल 2025 में इस सेक्टर का उत्सर्जन 8% और बढ़ गया है.
  • ग्रीन स्टील की तकनीक: ग्रीन स्टील बनाने की प्रक्रिया में कोयले की जगह ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (सौर या पवन ऊर्जा से बनी हाइड्रोजन) का इस्तेमाल किया जाता है. इससे उत्पादन के दौरान कार्बन का उत्सर्जन लगभग शून्य या बेहद कम हो जाता है.

लागत में सिर्फ 1% का अंतर: क्या सब कुछ महंगा हो जाएगा?

ग्रीन स्टील को लेकर सबसे बड़ा डर यह रहता है कि क्या इससे विकास कार्य बहुत महंगे हो जाएंगे? CII और क्लाइमेट कैटालिस्ट के संयुक्त अध्ययन ने इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है.

इसे आसान उदाहरणों से समझें

  • 100 करोड़ की मेट्रो लाइन: अगर कोई मेट्रो प्रोजेक्ट 100 करोड़ रुपये का है, तो ग्रीन स्टील का इस्तेमाल करने पर उसकी लागत सिर्फ 101 से 101.2 करोड़ रुपये होगी (यानी केवल 1 से 1.2 करोड़ का अंतर).
  • 30,000 रुपये की वॉशिंग मशीन: यदि घर में इस्तेमाल होने वाली वॉशिंग मशीन में ग्रीन स्टील लगाया जाए, तो उसकी कीमत में 300 रुपये से भी कम की बढ़ोतरी होगी.

2030 तक 1.6 करोड़ टन की सुनिश्चित मांग

अध्ययन के मुताबिक, हर साल सरकारी खरीद पर 45 से 50 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं. अकेले वित्त वर्ष 2024 में सरकारी परियोजनाओं में 3.16 करोड़ टन स्टील की खपत हुई, जिससे 7 करोड़ टन $CO_2$ निकला. 2030 तक सरकारी विभागों की स्टील मांग बढ़कर 7.3 करोड़ टन सालाना होने का अनुमान है.

यदि सरकार नीतिगत बदलाव करते हुए वित्त वर्ष 2028 से 1 करोड़ रुपये से अधिक के सभी सरकारी प्रोजेक्ट्स में कम से कम 26% ग्रीन स्टील का इस्तेमाल अनिवार्य कर दे, तो बाजार परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा.

  • सुनिश्चित बाजार: इससे साल 2030 तक देश में 1.6 करोड़ टन (16 MTPA) ग्रीन स्टील की पक्की मांग खड़ी हो जाएगी.
  • 37% का लक्ष्य: यदि इस अनिवार्य कोटे को बढ़ाकर 37% कर दिया जाए, तो यह मांग 2.4 करोड़ टन (24 MTPA) तक पहुंच सकती है.
  • पर्यावरण को फायदा: इस कदम से 2.97 करोड़ टन $CO_2$ की बचत होगी. यह हर साल सड़कों से 90 लाख कारों को हटाने के बराबर है.

उद्योग जगत आपूर्ति के लिए पूरी तरह तैयार

इस अध्ययन में शामिल देश के 28 बड़े स्टील उत्पादकों में से 26 (यानी 93%) ने साफ कहा है कि वे सरकार का स्पष्ट ऑर्डर मिलते ही प्रमाणित ग्रीन स्टील की सप्लाई शुरू करने के लिए तैयार हैं. बस उनकी मांग यह है कि सरकार लागत वसूली के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाए—चाहे वह ग्रीन प्रीमियम के रूप में हो, जीएसटी (GST) में छूट देकर हो या फिर कार्बन क्रेडिट के जरिए हो.

क्या कहती हैं निदेशक

क्लाइमेट कैटालिस्ट की निदेशक (भारत और नीति) साक्षी बलानी कहती हैं, “यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि एक मजबूत ग्रीन स्टील आदेश भारत के इस्पात क्षेत्र को किसी भी सब्सिडी या तकनीकी प्रोत्साहन से तेज गति से बदल सकता है. ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट ही वह मांग संकेत है जिसकी कमी थी, यह तुरंत उत्सर्जन घटा सकता है, बड़े पैमाने पर निवेश खोल सकता है और उद्योग को 2030 तक 16 से 24 एमटीपीए के हरित इस्पात बाजार की ओर ले जा सकता है.” उन्होंने कहा कि इस्पात क्षेत्र को साफ उत्पादन की ओर मोड़ने का सबसे असरदार औजार पहले से ही सरकार के हाथ में है. उसे बस एक खरीद आदेश कहते हैं.

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अभिषेक पाण्डेय पिछले 4 वर्षों से प्रभात खबर (Prabhat Khabar) में डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संस्थान 'दादा माखनलाल की बगिया' यानी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल (MCU) से मीडिया की बारीकियां सीखीं और अपनी शैक्षणिक योग्यता पूरी की है। अभिषेक को वित्तीय जगत (Financial Sector) और बाजार की गहरी समझ है। वे नियमित रूप से स्टॉक मार्केट (Stock Market), पर्सनल फाइनेंस, बजट और बैंकिंग जैसे जटिल विषयों पर गहन शोध के साथ विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं। इसके अतिरिक्त, इंडस्ट्री न्यूज, MSME सेक्टर, एग्रीकल्चर (कृषि) और केंद्र व राज्य सरकार की सरकारी योजनाओं (Sarkari Yojana) का प्रभावी विश्लेषण उनके लेखन के मुख्य क्षेत्र हैं। आम जनमानस से जुड़ी यूटिलिटी (Utility) खबरों और प्रेरणादायक सक्सेस स्टोरीज को पाठकों तक पहुँचाने में उनकी विशेष रुचि है। तथ्यों की सटीकता और सरल भाषा अभिषेक के लेखन की पहचान है, जिसका उद्देश्य पाठकों को हर महत्वपूर्ण बदलाव के प्रति जागरूक और सशक्त बनाना है।
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