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EXPLAINER: डिजिटल लेंडिंग को लेकर आरबीआई के नए नॉर्म्स से ग्राहकों को जानिए कैसे मिलेगी सुरक्षा

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EXPLAINER: डिजिटल लेंडिंग को लेकर आरबीआई के नए नॉर्म्स से ग्राहकों को जानिए कैसे मिलेगी सुरक्षा

EXPLAINER: भारत में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल लेंडिंग से जुड़े धोखाधड़ी और गैर-कानूनी व्यवहार को ध्यान में रखते हुए आरबीआई ने इसको लेकर नए नॉर्म्स जारी किए है. डिजिटल लेंडिंग को लेकर जारी किए गए नए नॉर्म्स में आरबीआई ने ग्राहकों के हितों का विशेष ख्याल रखा है. आरबीआई के नए नॉर्म्स के मुताबिक, अब सिर्फ रेगुलेटेड कंपनियां या संस्थाएं ही ग्राहकों को डिजिटल लोन देने के लिए योग्य होंगी. साथ ही लोन की सारी जानकारी क्रेडिट इंफो कंपनियों को देनी होगी. इसके अलावा, डिजिटल लेंडिंग कंपनियां या संस्थाओं को लोन देते समय ग्राहकों को बाकी सभी तरह के खर्च की जानकारी भी साथ में ही देनी होगी.

इन जरूरी बातों को आप भी जानें…

– मौजूदा गाइडलाइन के अनुसार, यदि किसी ग्राहक द्वारा दर्ज की गई किसी शिकायत का समाधान निर्धारित 30 दिनों की अधिकतम अवधि के भीतर नहीं किया गया तो वह रिजर्व बैंक एकीकृत लोकपाल योजना 7 के तहत शिकायत दर्ज कर सकता है.

– ग्राहकों द्वारा दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों को निपटाने की अच्छी व्यवस्था रखनी होगी.

– आरबीआई ने अपनी गाइडलाइंस में कहा है कि कोई भी डिजिटल लेंडिंग कंपनी या संस्था ग्राहक की मर्जी के बगैर लोन नहीं बांट सकेगी.

– आरबीआई के अनुसार, कंपनियों को लोन देने में कई तरह के मानक पूरे करने होंगे.

– कंपनियों को लोन एप्‍लीकेशन के समय ही कस्‍टमर को सभी तरह के शुल्क की जानकारी देनी होगी.

– आरबीआई ने यह भी कहा क‍ि डिजिटल लोन देने वाली कंपनी ग्राहक की मर्जी के बगैर लोन की सीमा नहीं बढ़ा सकती.

– रिजर्व बैंक की गाइडलाइंस के मुताबिक, ग्राहक की निजी जानकारी से जुड़े सभी डेटा की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेंडर की होगी.

– इसके साथ ही कोई भी डिजिटल लेंडिंग कंपनी का संस्था ग्राहकों की निजी जानकारी को खुद स्टोर नहीं करेंगे.

– कर्ज के सभी भुगतान और री-पेमेंट का लेनदेन सिर्फ कर्ज लेने वाले और रेगुलेटेड वित्तीय इकाई के बैंक खातों के बीच ही होना चाहिए. इसे किसी लेंडिंग सर्विस प्रोवाइडर या किसी भी थर्ड पार्टी के पूल एकाउंट के माध्यम से दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए.

– आरबीआई की नई गाइडलाइन में यह भी कहा गया है कि डिजिटल लेंडिंग ऐप्स अगर किसी तरह की फीस लेते हैं, तो उसका भुगतान कर्ज देने वाले बैंक या वित्तीय संस्थान को करना होगा. ऐसी किसी भी फीस का बोझ कर्ज लेने वाले पर नहीं डाला जाना चाहिए.

– रिजर्व बैंक ने कहा है कि डिटिजल लेंडिंग ऐप्स के जरिए सिर्फ वही डेटा कलेक्ट किया जाना चाहिए, जो जरूरी हो और उसका ऑडिट ट्रेल भी स्पष्ट होना चाहिए. इसके अलावा डेटा कलेक्शन के लिए कर्ज लेने वाले की स्वीकृति भी पहले से लेनी होगी.

जानिए सख्ती के पीछे की वजह

डिजिटल लोन देने वाले ऐप्स के खिलाफ आरबीआई को लगातार शिकायतें मिल रही थीं. इसी के मद्देनजर रिजर्व बैंक ने पिछले साल जनवरी में एक समिति गठित की थी. जिसे ऐसे लोन ऐप्स की अनियमितताओं का अध्ययन करने और इनके ऊपर लगाम लगाने के उपायों की सिफारिश करने का काम दिया गया था. मालूम हो कि डिजिटल लोन देने वाले ऐप्स आसानी से पहले कर्ज दे देते हैं और फिर उनके जाल से बाहर निकलना उतना ही मुश्किल हो जाता है.

लोन ऐप्स में चक्कर में फंसने के नुकसान

– ऐसे ऐप्स लोन बैंकों की तुलना में कई गुना ज्यादा ब्याज वसूलते है.

– किस्त समय पर नहीं भरने पर लोन ऐप्स कई गुना पेनाल्टी चार्ज करते हैं.

– इंस्टेंट लोन ऐप्स से ऋण लेने पर क्रेडिट स्कोर बुरी तरह से प्रभावित होता है.

– ज्यादातर ऐप्स रजिस्टर्ड नहीं होते हैं और उनका काम सिर्फ फर्जीवाड़ा करना होता है.

– ऐसे ऐप्स कर्ज देने से पहले ग्राहकों के फोन से संवेदनशील जानकारियां चुरा लेते हैं.

– इस तरह के ऐप्स लोन लेने वाले के फोन में सेव नंबर्स के साथ ही तस्वीरों का भी एक्सेस ले लेते हैं.

– इसके अलावा, कर्ज लेने वाले से किस्तें चुकाने में देरी हुई होने पर उन्हें ब्लैकमेल करना शुरू कर देते है.

– कई बार ऐप्स लोन देने से पहले ही भारी-भरकम टैक्स और चार्जेज काट लेते हैं.

– इसके साथ ही कई बार कर्जदार के साथ फोन कर गाली-गलौज के मामले भी सामने आए है.

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