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भारत अपने रुख पर कायम, WTO वार्ता विफल

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भारत अपने रुख पर कायम, WTO वार्ता विफल

नयी दिल्ली : भारत के अपने रुख पर कायम रहने के कारण WTOवार्ता विफल हो गयी है. जिनेवा में चल रही इस मुद्दे पर बातचीत का कोई निष्कर्ष नहीं निकला. लगभग 11 घंटों तक इस मुद्दे पर चर्चा होती रही लेकिन किसी ठोस फैसले तक नहीं पहुंचा जा सका.

विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के बीच वैश्विक स्तर पर सीमा-शुल्क नियम को आसान बनाने के लिए व्यापार सुविधा समझौते पर सहमति नहीं होने के बावजूद भारत ने आज कहा कि यह समझौते के प्रति प्रतिबद्ध है और वह अपने खाद्य सुरक्षा मामले के स्थायी समाधान ढूंढने के प्रस्ताव को आगे बढ़ाना जारी रखेगा. वाणिज्य सचिव राजीव खेर ने कहा कि आगे की कार्रवाई के बारे में सोचने के लिए पर्याप्त समय है. निश्चित तौर पर हमारा प्रस्ताव सबके सामने है और हम अपने प्रस्ताव को आगे बढ़ायेंगे.

पिछली रात जिनेवा में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के 160 सदस्य वैश्विक सीमाशुल्क समझौते पर सहमत होने में नाकाम रहे जिसे आम तौर पर व्यापार सुविधा समझौता (टीएफए) कहा जाता है. खेर ने कहा, हम व्यापार सुविधा समझौते के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता से अपना कदम कभी नहीं खींचा है. हमने अपना प्रस्ताव (गरीबों के लिए अनाज के सार्वजनिक भंडार के संबंध में) उचित तरीके से विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक के सामने रखा है. लेकिन हम सहमति बनाने में नाकाम रहे.

WTOके डायरेक्टर जनरल ने जतायी निराशा

WTO के डायरेक्टर जनरल रॉबर्टो एजिबेडो ने इस मुद्दे पर अपनी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को सुनकर किसी फैसले तक पहुंचने में हम असफल रहे और इस मुद्दें पर बातचीत विफल रही. मैंने इस मुद्दे पर दोनों के बीच सभी संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की .

सभी देशों के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं मैंने इस मुद्दे पर दोनों के बीच सभी संभावनाओं को तलाशने की कोशिश की . हमें जितना समय मिला वह काफी कम है इतने कम समय में इस मुद्दे पर किसी फैसले पर पहुंचना संभव नहीं है. उन्होंने सभी देशों के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने इस मुद्दे को सुलझाने की हरसंभव कोशिश की है.

क्या बनी थी सहमति और कहां फंसा है पेच

भारत वैसे विकासशील देशों में है जो खाद्य सुरक्षा और अपने नागरिकों के भोजन के अधिकार को लेकर सजग है. WTOके नियमों के अनुसार देश की कुल खाद्य उत्पति के खर्च का सिर्फ दस प्रतिशत होना सब्सिडी में खर्च होना चाहिए. विकासशील देशों के लिए इस खर्च में अपनी योजनाओं को लागू करना संभव नहीं है. इसके अलावा भारत अगर इस समझौते पर अपनी सहमति बनाता है, तो उस अपने भंडारण के पूरे आकड़े WTOको मुहैया कराने होंगे.

दूसरी तरफ विकसित देश भी व्यापार में बंदगाहों पर तेजी से आयात निर्यात पर जोर देने के अलावा निर्यात पर मिलने वाले छूट और दूसरी सुविधा की ओर भी विशेष ध्यान नहीं दे रहा है. कुल मिलाकर कृषि में विकासशील देश कृषि सीमित सब्सिडी के पक्ष में नहीं है तो दूसरी ओर विकसित देश भी ट्रेड और पोर्ट में सुविधा देकर इस विवाद को खत्म करने की ओर अग्रसर होते नहीं दिख रहे.

विकसित देश बनाम विकासशील देश

WTO में जारी पूरा विवाद विकसित और विकासशील देशों के बीच सिमटा है. विकासशील देशों के लिए व्यापार सुविधा समझौते बेहद अहम है इस समझौते से उन्हें व्यापार में कई तरह की सुविधाएं और रियायत मिलेगी. लेकिन विकसित देश खाद्य सुरक्षा बिल और कृषि में मिलने वाली सब्सिडी को लेकर अड़े हैं. इस मुद्दे पर भारत अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है.

अमेरिका भी बना रहा है दबाव

अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी तीन दिनों की भारत यात्रा पर हैं. भारत आने से पहले ही उन्होंने अमेरिका में जारी किये एक बयान में हळड के प्रति भारत के रुख से नाराजगी जाहिर कर दी थी. उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे पर भारत के पक्ष से असंतुष्ट हैं. यात्रा शुरु होने से पहले केरी का यह बयान भारत पर दबाव बनाने का एक प्रयास था. केरी ने भारत आने के बाद वित्त मंत्री जेटली से भी मुलाकात की.

अपने रुख पर कायम है भारत

जिनेवा में इस मुद्दे पर जारी बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहीं अंजलि प्रसाद ने भारत का रुख बड़ी मजबूती से रखा है. दूसरी और अमेरिकी वाणिज्य मंत्री पेनी प्रित्जकर से मुलाकात के बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने संवाददाताओं को बताया, ‘हमारा रुख वही है जो पहले था.’ इस पर प्रित्जकरने अमेरिका को इस बात पर बहुत निराशा हुई है कि भारत ने दिसंबर में डब्ल्यूटीओ में अपने समझौतों से कदम पीछे कर लिया है.

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