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Home Business … तो क्या यशवंत सिन्हा के ”हल्लाबोल के बाद दबाव में दिखी सरकार

… तो क्या यशवंत सिन्हा के ”हल्लाबोल के बाद दबाव में दिखी सरकार

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… तो क्या यशवंत सिन्हा के ”हल्लाबोल के बाद दबाव में दिखी सरकार

खामोश हो चुकी विपक्ष और आक्रमक मूड में रहने वाले मोदी सरकार का आत्मविश्वास आर्थिक मोर्चे पर हिलता नजर आ रहा है. आर्थिक मुद्दे को एजेंडा बनाकर सत्ता में आयी मौजूदा सरकार लगातार नियम बदलने के लिए कुख्यात रही. जीएसटी काउंसिल की बैठक के बाद सरकार ने कई नये बदलावों की घोषणा की, लेकिन यह बदलाव अनायास नहीं थे. पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के एक लेख के बाद सरकार दबाव में दिखी. यशवंत सिन्हा के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे लेख ने वो काम किया जो विपक्षी पार्टियां भी नहीं कर सकी. इससे पहले कि मामला हाथ से निकलता सरकार ने जीएसटी में बदलाव किये.

सरकार की आर्थिक नीति में गड़बड़ी को लेकर विपक्षी पार्टियां लगातार सवाल उठा रही थी. भाजपा के अंदर अरुण शौरी और सुब्रमण्यम स्वामी ने भी सवाल उठाये थे लेकिन उनके बातों का असर नहीं दिखा. दोनों ही नेताओं की छवि लगातार आलोचना या हमला करने वाले नेताओं में रही है लेकिन यशवंत सिन्हा की बात को गंभीरता से लिया गया. लिहाजा सरकार डिफेंड मूड में आ गयी. हालांकि व्यापारियों के बीच इस बात को लेकर आक्रोश तो पहले से ही था लेकिन वह खुलकर सामने नहीं आ पा रहा था.
लगातार नियम बदल रही है सरकार
नोटबंदी, बैंकिंग व्यवस्था, जीएसटी में लगातार हो रहे बदलाव की वजह से लोगों का भरोसा बाजार में टूट रहा है. सरकार ने पहले बैंकों के खाते खोलकर पीठ थपथपाये लेकिन बैंकों में लगातार नियम बदले गये. लिहाजा बैंक और ग्राहकों के बीच दूरी बढ़ती गयी. नोटबंदी ने एक अलग तरह का माहौल पैदा कर दिय़ा. अर्थशास्त्री ज्यां द्रेंज ने नोटबंदी फैसले पर कहा कि चलती कार के टायर में गोली मारने जैसा फैसला है नोटबंदी.
नोटबंदी के बाद लोग अब सहमे – सहमे नजर आने लगे हैं . लोगों को इस बात का डर है कि सरकार कहीं कोई नया नियम नहीं ले आये. जीएसटी को मौजूदा सरकार की सबसे उपलब्धि मानी जा रही है. लेकिन इसे लागू करने में सरकार की हड़बड़ी साफ दिखी. दरअसल 2019 में लोकसभा चुनाव आने से पहले सरकार जीएसटी के दुष्प्रभावों को खत्म करना चाहती थी, इसलिए इसे समय से पहले हड़बड़ी में लागू कर दिया. जीएसटी के पहले जो तैयारी की जानी चाहिए थी. वह हो नहीं पायी. लिहाजा इसके दुष्प्रभाव बढ़ गये.
स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया में नहीं मिल पायी कामयाबी
सरकार के दो – चार योजनाएं सफल रही है. इनमें निर्धन परिवारों को एलपीजी गैस का वितरण, एलईडी वितरण, स्वच्छता के तहत शौचालय निर्माण और आवास योजना शामिल है लेकिन सरकार की फ्लैगशिप स्कीम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ नाकाम रही है. मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में भारत के पास कई मौके थे. हालांकि कई बड़ी मोबाइल कंपनियों ने अपने मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट देश में लगाये लेकिन देश में मैन्यफैक्चरिंग के छोटे उपक्रम नहीं खुले, जिसे रोजगार पैदा नहीं हो सका. मार्गन एंड स्टैनले के रूचिर शर्मा के मुताबिक सरकार को सबसे पहले खिलौना और इलेक्ट्रॉनिक आइटम के विनिर्माण पर जोर देना चाहिए. मैन्यूफैक्चरिंग के लिए हमेशा शुरुआत छोटी चीजों से करनी चाहिए. रूचिर शर्मा कहते हैं कि चीन ने इन सामानों का उत्पादन कर वैश्विक बाजार में अच्छा पकड़ बनाया. खिलौने और इलेक्ट्रॉनिक आइटम के उत्पादन में हाइस्किल टेक्नोलॉजी की जरूरत नहीं होती है और यह कम पूंजी में भी खड़ा किया जा सकता है लेकिन भारत में मोदी सरकार हथियार बनाने के ख्वाब पाले रखे. जिसके लिए उच्च तकनीकी ज्ञान और रिसर्च की आवश्यकता होती है, जिसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता है.
भ्रष्टाचार को लेकर सरकार ने बरतीसख्ती
भ्रष्टाचार को लेकर मोदी सरकार ने सक्रियता दिखायी. सभी बैंक अकाउंट को आधार से जोड़ा गया. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एनपीए का मुद्दा जोर – शोर से उठाया लेकिन एनपीए कम होने की बजाय बढ़ता गया. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक राजन ने शोर तो काफी मचाया लेकिन कुछ ठोस नहीं कर पाये. रघुराम राजन की वजह से बैंकों से कर्ज लेने वाले और देने वाले दोनों डर गये. लिहाजा निजी निवेश गिरता गया. हलांकि दिवालिया कानून लागू होने की वजह से लंबे समय में फायदा हो सकता है.

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