[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home B-Positive उम्मीद का दामन नहीं छोड़ें

उम्मीद का दामन नहीं छोड़ें

0
उम्मीद का दामन नहीं छोड़ें

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए 24 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन कर दिया गया. संक्रमण से बचने के लिए देश के पास शायद ही कोई और उपाय था, लेकिन 130 करोड़ की आबादी वाले देश में ये कोई आसान काम भी नहीं है. करीब 12 दिन बीत गये हैं. देश की बड़ी आबादी को कई मानवीय परेशानियों से रूबरू होना पड़ रहा है. महानगरों से बड़ी संख्या में लोगों के अपने घर लौटने की सूचनाएं आ रही हैं और इसमें से कुछ ऐसी भी खबरें हैं, जिसे देख-पढ़ कर मन अंदर तक सिहर जा रहा है.

लॉकडाउन के बाद मेरे एक परिचित ने बताया कि उनके फूड स्टॉल में एक लड़का काम करता है. वह रात को ही पैदल रांची से चंदनकियारी (करीब 140 किमी) के लिए निकल गया और दो दिनों में अपने घर पहुंच गया. ये जज्बा सुखद है.

महानगरों से पलायन की खबरें लगातार आने लगीं, जो हृदय को अंदर तक झकझोर देती है.

इनमें से कुछ घटनाओं का जिक्र मैं करना चाहूंगा.

पहली घटना- एक इंसान दिल्ली से उत्तरप्रदेश अपने गांव के लिए पैदल ही निकल गया. उसके साथ तीन महीने की बच्ची, पत्नी और 58 साल की मां है. घर तक पहुंचने में उसे सात दिन लगेंगे.

दूसरी घटना – एक व्यक्ति अहमदाबाद से बांसवाड़ा करीब 258 किलोमीटर दूर अपनी पत्नी को कंधे पर लेकर निकल गया. उसकी पत्नी का पैर फ्रैक्चर हो गया है.

ये घटनाएं एक तरफ इंसान के अंतहीन दर्द को बयां करती हैं, वहीं इसका दूसरा पहलू ये है कि इंसान में संघर्ष की कितनी क्षमता है, वो जीने के लिए किस स्तर तक अथक प्रयास कर सकता है.

इन घटनाओं के बीच कुछ ऐसी कहानियां भी आ रही हैं जो कुछ हटकर हैं. मुश्किल हालात में कैसे राह निकाला जाये. समाज में कैसे सार्थक योगदान दिया जाये.

केस स्टडी- छत्तीसगढ़ के कांकेर में आदिवासी महिलाओं ने कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए पतों का मास्क और राख को सेनिटाइजर बना लिया है.

पहले दो केस स्टडी में इंसान जीवन के एक ऐसे दौर में है, जब चीजें बिल्कुल विपरीत हैं. शायद आज भी वही हालात हैं. कोरोना की इस सुनामी का फलसफा ये है कि हालात बिल्कुल विपरीत हों, तो उसके गुजर जाने का इंतजार करने के अलावा कुछ करने को नहीं रह जाता. तीसरे केस स्टडी में इंसान विपरीत हालात में कैसे नई राह बनाता है इसकी कहानी है.

समुद्र की लहरों के सामने या तूफान के सामने जब कोई इंसान होता है तो वो उसके सामने सीना तानकर खड़ा नहीं होता, बल्कि झुककर गुजरने देता है.

ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हमें धैर्य रखना है. उम्मीद करना है कि जीवन में बेहतर दिन आएंगे और इन्हीं बेहतर दिनों की उम्मीद में अपनी तरफ से लगातार कोशिश करते रहना है.

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel