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तीरंदाजी के लिए गोल्डन गर्ल कोमालिका का बिक गया था घर, जिद से जीत लिया जहां

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तीरंदाजी के लिए गोल्डन गर्ल कोमालिका का बिक गया था घर, जिद से जीत लिया जहां

।।विजय बहादुर।।

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फाइनल में थोड़ी नर्वस थी, लेकिन हर तीर शूट करने से पहले लंबी-लंबी सांसें ले रही थी, ताकि खुद को एकाग्रचित कर सकूं. जीत की खुशी है. अब और मेहनत कर ओलंपिक में देश के लिए मेडल जीतना है. आत्मविश्वास से लबरेज ये शब्द गोल्डन गर्ल कोमालिका बारी के हैं. स्पेन में आयोजित वर्ल्ड यूथ आर्चरी चैंपियनशिप के महिला एकल कैडेट रिकर्व में भारत की तीरंदाज कोमालिका बारी ने जापान की वाका सोदोका को 7-3 से हरा कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया है. तीरंदाजी में उसका घर बिक गया था, लेकिन जिद से छोटी उम्र में बड़ी कामयाबी हासिल कर उसने जहां जीत लिया है.

जमशेदपुर की बिटिया कोमालिका महज 17 साल की है. ग्रेजुएट कॉलेज में 12वीं की छात्रा है. वह न सिर्फ तीरंदाजी में अव्वल है, बल्कि पढ़ाई में भी तेज है. वह टाटा तीरंदाजी अकादमी की तीरंदाज है. मां-पिता के सपनों को साकार करने वाली कोमालिका का परिवार ने विपरीत परिस्थितियों में भी साथ दिया और अपनी मेहनत के बल पर उसने विश्व में सफलता के झंडे गाड़ दिये.
कोमालिका की मां लक्ष्मी बारी आंगनबाड़ी सेविका हैं. पिता घनश्याम बारी एलआइसी एजेंट हैं. मां को तीरंदाजी का शौक था, लेकिन वह नहीं कर पायी थीं. उनकी इच्छा थी कि उनकी बिटिया तीरंदाजी सीखे और नाम रोशन करे. पापा भी चाहते थे कि उनकी बिटिया फिट रहे. लिहाजा कोमालिका को तीरंदाजी सेंटर भेज दिया गया. शुरुआत में कोमालिका को तीरंदाजी में मन नहीं लग रहा था. जब ट्रेनिंग सेंटर में तीरंदाज सानिया शर्मा से उसकी दोस्ती हुई, तो दोनों साथ में तीरंदाजी करने लगीं. धीरे-धीरे यह शौक जुनून बन गया और फिर करियर.
कोमालिका के पिता घनश्याम कहते हैं कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह तीरंदाजी की दुनिया में करियर बनाकर नाम कमायेगी. उनकी कोशिश तो यही थी कि कोमालिका फिट रहे. तीरंदाजी में उसके कदम धीरे-धीरे बढ़ने लगे. इससे उनकी आर्थिक परेशानी बढ़ने लगी. डेढ़ से तीन लाख के धुनष समेत अन्य किट खरीदना उनके बूते के बाहर था. आखिरकार उन्होंने अपनी बिटिया के सपने साकार करने के लिए अपना घर बेचने का निर्णय लिया.
जैसे ही घर का सौदा तय हुआ और पैसे मिले, वैसे ही कोमालिका को टाटा आर्चरी एकेडमी में जगह मिल गयी. जहां से उसे सभी सुविधाएं मिलने लगीं. घर का पैसा उनके पास ही रह गया. घर बेचने का मलाल तो हुआ, लेकिन स्पेन में आयोजित विश्व युवा तीरंदाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने की खबर सुनते ही सीना गर्व से चौड़ा हो गया. घर-द्वार का क्या है. ये आगे-पीछे बनते रहेंगे. उनकी इच्छा है कि कोमालिका ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करे.
वर्ष 2012 की बात है. आइएसडब्ल्यूपी (तार कंपनी) तीरंदाजी सेंटर से कोमालिका ने अपने करियर की शुरुआत की थी. कोच सुशांतो पात्रो कहते हैं कि वर्ष 2012 में तार कंपनी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में समर कैंप का आयोजन किया गया था. इसमें शिक्षा निकेतन की छात्रा के रूप में कोमालिका भी शामिल हुई थी. वह अपने चचेरे भाई राजकुमार बारी के साथ रोजाना 18 किलोमीटर दूर साइकिल से अभ्यास के लिए आती थी. एक महीने का समर कैंप तो खत्म हो गया, लेकिन कोमालिका ने अभ्यास जारी रखा और वह सेंटर की नियमित प्रशिक्षु बन गयी.
लगभग चार वर्षों के दौरान मिनी व सब जूनियर राष्ट्रीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन के बाद कोमालिका को वर्ष 2016 में टाटा आर्चरी अकादमी में जगह मिल गयी. वहां द्रोणाचार्य पुरस्कार से पुरस्कृत पूर्णिमा महतो और धर्मेंद्र तिवारी जैसे प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में कोमालिका का नया सफर शुरू हुआ. महज तीन वर्षों में ही वह कैडेट वर्ल्ड चैंपियन के रूप में उभर कर सामने आ गयी. अब तक के करियर में वह लगभग डेढ़ दर्जन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुकी है.
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