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सोच और कार्य में ईमानदारी हो, तो सफलता तय है

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सोच और कार्य में ईमानदारी हो, तो सफलता तय है
विजय बहादुर
vijay@prabhatkhabar.in
www.facebook.com/vijaybahadurranchi/
twitter.com/vb_ranbpositive


रमेश भदौरिया,पार्कर हैनिफिन कॉर्पोरेशन में 11 वर्षों की सेवा देने के बाद दो माह पूर्व रिटायर हो गये. महाप्रबंधक और प्रबंध निदेशक जैसे शीर्ष पदों पर सेवा दे चुके भदौरिया कहते हैं कि अपनी सोच और कार्य में ईमानदारी हो, तो सफलता तय है. युवाओं को बेहतर शिक्षा लेने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि जुनून और लगन होने के बावजूद बेहतर शिक्षा ही लंबी छलांग लगाने में उत्प्रेरक का काम करती है.
अपनी स्थापना के 100 साल पूरा कर रही है कंपनी
अमेरिकी कंपनी पार्कर हैनिफिन कॉर्पोरेशन की विश्व के 46 देशों में शाखाएं हैं. 54 हजार से अधिक कर्मचारी हैं. यह कंपनी अपनी स्थापना के 100 साल पूरा कर रही है.
बीआइटी से की थी इंजीनियरिंग
रमेश भदौरिया की स्कूलिंग विकास विद्यालय, रांची से हुई. उन्होंने बीआइटी से इंजीनियरिंग कर मल्टीनेशनल कंपनियों में सेवा देकर झारखंडी प्रतिभा का लोहा मनवाया. भदौरिया ने क्रॉम्पटन ग्रीब्स, इंडियन एल्युमिनियम (इनडॉल) समेत कई कंपनियों में बेंगलुरु, दिल्ली व शंघाई में अपनी सेवाएं दी.
जीवन का टर्निंग प्वाइंट
रमेश भदौरिया ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई स्थित क्रॉप्टन ग्रीब्स ज्वाइन कर लिया. वे बताते हैं कि ब्रिटिश मल्टीनेशनल कंपनी कोर्टाउलडस कंपनी ज्वाइन करना उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था. यहां उन्होंने छह साल सेवाएं दीं. वह इस अमेरिकी कंपनी ज्वाइन करनेवाले पहले भारतीय थे. कंपनी को गोवा में एक ग्रीन फील्ड प्रोजेक्ट शुरू करना था. इस प्रोजेक्ट के लिए लोगों की नियुक्ति करना, सप्लाइ चेन, बिक्री से लेकर सभी प्रक्रियाओं में वे शामिल रहे. शंघाई में तब इस कंपनी का प्रदर्शन ठीक नहीं था, तो कंपनी ने उन्हें कंट्री हेड (एमडी) बनाकर वहां भेजा. इसके बाद उस कंपनी का वहां कायाकल्प हो गया. कंपनी फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखी.
रांची के लिए आज भी धड़कता है दिल
झारखंड से दूर हैदराबाद में रहने के बावजूद भदौरिया का दिल चाईबासा व रांची के लिए आज भी धड़कता है. वह बताते हैं कि उनके पिता ने आइएसएम, धनबाद से पढ़ाई पूरी करने के बाद पश्चिम सिंहभूम में चाईबासा स्थित झींकपानी एसीसी कंपनी ज्वाइन किया था. 34 साल तक सेवा देने के बाद वे सीनियर माइंस मैनेजर के पद से रिटायर हो गये थे.
पारदर्शी तरीके से हो टीम का नेतृत्व
चाईबासा जैसी छोटी जगह और मध्यमवर्गीय पारिवारिक पृष्ठभूमि में परवरिश होने के बावजूद आपने जीवन में इतनी ऊंचाई कैसे तय की? इस सवाल का बहुत ही सहजता से जवाब देते हुए कहते हैं कि मेरे हिसाब से सफलता का सूत्र बहुत ही सरल है. कोई भी इंसान लगन और जुनून के साथ कड़ी मेहनत करे, अपनी सोच और कार्य में ईमानदारी रखे, तो उसकी सफलता निश्चित है. अगर वो टीम लीडर है, तो उसे टीम का नेतृत्व पारदर्शी तरीके से करना होगा.
भय दूर कर टीम वर्क के लिए माहौल बनाया
पार्कर हैनिफिन कॉर्पोरेशन में टीम बिल्डिंग कैसे की, इसका उदाहरण देते हुए भदौरिया बताते हैं कि बहुत ही छोटे-छोटे तरीकों को उन्होंने आजमाया. अमेरिकी कंपनी होने के नाते सबमें यह भय था कि क्या होगा. उन्होंने इस भय को दूर करने के लिए अच्छे कर्मियों (महिला व पुरुष) दोनों को सम्मानित करना शुरू कर दिया. मैनेजरों की स्वास्थ्य जांच शुरू करवायी. सभी कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य संबंधी जांच का काम शुरू करवाया. फिर खेल जैसे- क्रिकेट, कैरम, टेबल टेनिस के टूर्नामेंट आयोजित करवाये. यहां उन्होंने पैटपार्कर स्कॉलरशिप शुरू कराया. यह स्कॉलरशिप एक बेटा व एक बेटीवाले कर्मचारियों के लिए था. यह स्कॉलरशिप उनके बच्चों के खेल, पढ़ाई व अन्य गतिविधियों में उनकी सक्रियता के आधार पर दिया जाने लगा. वे उन कर्मचारियों के गृह प्रवेश और उनके यहां आयोजित होनेवाले विवाह समारोह में शामिल होने लगे. इसमें कोई खास पैसे खर्च नहीं हो रहे थे, लेकिन पूरी टीम मोटिवेट हो रही थी. उनके उत्साह में लगातार इजाफा हो रहा था, क्योंकि कर्मचारियों को लग रहा था कि वे केवल कंपनी के टर्नओवर पर ही नहीं, उन पर भी ध्यान दे रहे हैं. फिर मैंने कंपनी के ग्रोथ प्लान को सभी मैनेजरों के साथ साझा करना शुरू किया, ताकि उन्हें उनके उज्ज्वल भविष्य की जानकारी मिल सके. ग्राहकों को अच्छी सर्विस और गुणवत्ता वाले उत्पाद देने पर विशेष फोकस किया. इसका तेजी से असर हुआ. पूरी टीम प्रेरित होती गयी और बेहतर नतीजे आने लगे.
मेरे खुद के अनुभव से मेरे ये विचार और पुख्ता हो गये कि एक इंसान के लिए पैसा महत्वपूर्ण है, लेकिन वो उसी जगह बेहतर आउटपुट दे पाता है, जहां उसे काम करने का बेहतर माहौल मिलता है और जहां उसे भविष्य की बेहतर संभावनाएं नजर आती है.
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