-पुष्यमित्र-
क्या यह फैसला इन छोटी-छोटी नदियों को जीवन दे पायेगा जो रक्त शिराओं की तरह पूरे उत्तर बिहार में फैली हैं और हाल-हाल तक इस पूरे इलाके के पर्यावरण को नमी और जैव-विविधता से परिपूर्ण बनायेगा. क्या इस फैसले के तहत एडवोकेट जनरल बिहार सरकार से कह पायेंगे कि तमाम नदियों को तटबंधों से मुक्त कर दें, तभी इनकी 206 धाराएं जिंदा रह पायेंगी. यह भी देखना है.
जज साहब ने सोचा होगा कि जब न्यूजीलैंड की किसी नदी को मानवाधिकार मिल सकता है तो भारत की पावन नदी गंगा-यमुना को क्यों नहीं. चलिये, उन्होंने जो भी सोचा हो, यह क्रांतिकारी फैसला है. हम उम्मीद करते हैं कि जज साहब ने जिस विचार के वश में आकर यह फैसला सुनाया है, सरकार भी इस फैसले को लागू करने में वैसी ही संवेदनशीलता दिखायेगी. क्या यह उम्मीद हम अपनी सरकारों से रख सकते हैं?
